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Showing posts from 2011

दलित का नामकरण

दलित का नामकरण पहले डोम ,चमार ,दुसाध पाशी ,धोबी और अनेक थे . फिर उन्हों ने एक जमात बनाई, और सब लोगो को बताई , कि वे भगवान के सपूत हैं , "हरिजन " हैं ये सबको समझाई , इसी नाम से चिपके रहे वर्षो , इन्तजार करते रहे चमत्कार का , रहनुमा उनके ,उन्हें बेचते रहे , और ये लोलीपोप चूसते रहे . वर्षो बाद भीर एक सुझाव आया , फिर से अपना नाम बदलवाया , अब इन्हें दलित कहते हैं , नए पैक में वही सामान बेचते हैं, उनके तथाकथित भगवान , उन्हें बहलाते है ,फुसलाते हैं , फिर भी काम न हो पाए , तो बरगलाते हैं , और वोट ले कर उड़न-छू हो जाते हैं. दलित के देवताओ के भाषण सुने हमने , वे उन्हें अलगाववादी बनाते है , धर्म-परिवर्तन कि राह दिखाते हैं . सदियो पहले हुए अन्याय , अत्याचार ,बलात्कार और अपमान , कि कहानी सुनाते है, उन सब की याद दिला-दिला कर , उन्हें डराते है , और फिर वोट ले कर उड़न-छू हो जाते है . मैंने पूछा था एक ऐसे ही देवता से , तुमने क्या किया उथान के लिए ? उसने सारे जबाब दिए , कि हमने पत्थर कि मूर्तियाँ बनवाई , पार्क बनवाए , हथियो का झुण्ड खड़ा किया , हमने भाषण दिए , और सच का परचम फहराया . मैंने कहा च...

नेता खड़ा करना नहीं , परिवर्तन लक्ष्य था .

नेता खड़ा करना नहीं , परिवर्तन लक्ष्य था . महत्वकांक्षा होती ही है , सामूहिक यज्ञ का संकल्प था , नेता खड़ा करना नहीं , परिवर्तन लक्ष्य था . प्रसिद्ध होना नहीं , परमार्थ का प्रण था , नेता खड़ा करना नहीं , परिवर्तन लक्ष्य था . लड़ तो हम रहे ही हैं , इसे आन्दोलन बनाने का प्रश्न था . नेता खड़ा करना नहीं , परिवर्तन लक्ष्य था . आपस में सदियो से लड़ ही रहे हैं , ये एक साथ लड़ने का मंच था , नेता खड़ा करना नहीं , परिवर्तन लक्ष्य था . पत्थर तो हम फेक रहे हैं , यहाँ ज्वारभाटा पैदा करने का सामर्थ था , नेता खड़ा करना नहीं , परिवर्तन लक्ष्य था . जी तो जानवर भी लेते हैं , स्वाभिमान जगाना हमारा मकसद था , नेता खड़ा करना नहीं , परिवर्तन लक्ष्य था . केकड़ा तो हम है ही , यहाँ एक-दूजे के लिए जीने का वचन था , नेता खड़ा करना नहीं , परिवर्तन लक्ष्य था . अन्याय तो हम सह ही रहे हैं , यहाँ विरोध का विकल्प था , नेता खड़ा करना नहीं , परिवर्तन लक्ष्य था . व्यग्तिगत एजेंडा नहीं , यहाँ सामूहिक उद्देश्य था , नेता खड़ा करना नहीं , परिवर्तन लक्ष्य था .

आरक्षण तो आरक्षण होता है

दे लो कितना भी तर्क , बहस छेड़ दो दुनिया में , ठहरा लो उचित कितना भी, लेकिन आरक्षण तो आरक्षण होता है . कितना भी हो मीठा , चाहे पूरी दुनिया पीती हो , लेकिन जहर तो जहर होता हैं . कितना भी रगड़ लो साबुन , सिदियों उसे साफ़ करो , लेकिन कोयला तो कोयला ही होता है . दूध पिलाओ जिंदगी भर , लाख प्रयत्न करो लो मित्रता का , लेकिन सांप तो सांप होता है . कितना भी महान बन लो , विजय का धौस दिखा लो, लेकिन मौत तो मौत होता हैं , झंडे उठा के घुमो , आन्दोलन खड़ा कर दो , बवाल मचाओ , या क़त्ल -ए-आम करो , लेकिन सरकार तो सरकार होती हैं .
हाय रे ! महंगाई , हाय रे ! FDI पहले जाति को बेचा , फिर भाषा को बेचा , फिर क्षेत्रवाद को बेचा , अब बेच रहे किसान को , हाय रे ! महंगाई , हाय रे ! FDI जंगलो को बेचा , पहाड़ों को बेचा , अब बेच रहे खेत-खलिहान को , हाय रे ! महंगाई , हाय रे ! FDI सम्मान को बेचा , संस्कार को बेचा , परम्परा के अभिमान को बेचा , अब बेच रहे ईमान को , हाय रे ! महंगाई , हाय रे ! FDI . कपडे को बेचा , कंगन को बेचा , होठो के रंगत को बेचा , अब बेच रहे अपने दूकान को , हाय रे ! महंगाई , हाय रे ! FDI
कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है मित्र के वेश में करता प्रहार हैं , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है . काया इसका काला हैं , कि कर्म इसका काला , आस्तीनों के सांपो का , यही तो धर्म है , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है . नेता कि खाल में , कि अफसर कि लिवाज़ में , बाज़ार के इस भाव में , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है . आरक्षण कि आड़ में , कि जाति की की छाव में , कि धर्म कि बाज़ार में , कि भाषा की बयार में , की क्षेत्रवाद के अफीम में , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है . बिक चुके अखबार में , कि वेश्या TB चेनलो में , कि साहित्य के संसार में , कि विज्ञान के अहंकार में , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है . नशाखोरी की जिंदगी में , कि सेक्स कि गुलामी में , अहंकार कि लड़ाई में , कि डर के गहराई में , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है . FDI की में बहार में , कि महंगाई कि मार में , रिश्वतखोरी कि चाह में , आम्भी कुमारो के गाँव में , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है सुभाष कि लड़ाई में , कि गाँधी कि सच्चाई में , नेहरु कि अगवाई में , विरासत कि बेहयाइ में , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है . किसानो के आत...

कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है

कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है मित्र के वेश में करता प्रहार हैं , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है . काया इसका काला हैं , कि कर्म इसका काला , आस्तीनों के सांपो का , यही तो धर्म है , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है . नेता कि खाल में , कि अफसर कि लिवाज़ में , बाज़ार के इस भाव में , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है . आरक्षण कि आड़ में , कि जाति की की छाव में , कि धर्म कि बाज़ार में , कि भाषा की बयार में , की क्षेत्रवाद के अफीम में , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है . बिक चुके अखबार में , कि वेश्या तब चेनलो में , कि साहित्य के संसार में , कि विज्ञान के अहंकार में , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है . नशाखोरी की जिंदगी में , कि सेक्स कि गुलामी में , अहंकार कि लड़ाई में , कि डर के गहराई में , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है . फदी में बहार में , कि महंगाई कि मार में , रिश्वतखोरी कि चाह में , आम्भी कुमारो के गाँव में , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है सुभाष कि लड़ाई में , कि गाँधी कि सच्चाई में , नेहरु कि अगवाई में , विरासत कि बेहयाइ में , कौन गद्दार हैं ,ये कौन गद्दार है . किसानो के आत्महत...
RANJAN MISHRA मैं तेरा दीवाना हूँ , तू ये मानोगी जरूर , आज मानो या न मानो , कल ये मानोगी जरूर , मैं तेरा दीवाना हूँ , तू ये मानोगी जरूर. जाओ जितना भी तू दूर , लौट के आओगी जरुर . मैं तेरा दीवाना हूँ , तू ये मानोगी जरूर. RANJAN MISHRA चकाचौध में खो गयी हो , है नहीं ये तेरा कसूर , आज नहीं तो कल को ही , तुम समझ जोयेगी जरूर , मैं तेरा दीवाना हूँ , तू ये मानोगी जरूर. मुझको है तेरी जरुरत , मुझको है तुमसे ही प्यार , आज नहीं तो कल ही , घर आओगी जरूर , मैं तेरा दीवाना हूँ , तू ये मानोगी जरूर. अकेले-अकेले थक जोयेगी , दूर होगा तेरा गरूर , मैं तेरा दीवाना हूँ , तू ये मानोगी जरूर. RANJAN MISHRA

टेक्निकल मजदूर भईले सईया हमार

टेक्निकल मजदूर भईले सईया हमार , जब से चलल बा टेक्निकल के बयार बंगलोर में नौकरी करे सईया हमार , सुने नी की सईया इंजिनियर हवे , पर दिन-रात खटले भईले सईया हमार , सूबे-सूबे सात बजे हो जले तैयार , आवे ले राती के बारह बजे थक- हार , टेक्निकल मजदूर भईले सईया हमार , साल में एके बार आवेले घरे हर रात याद दिलावे सईया हमार , रात भर नेट पर चैट करे सईया,

ब्राह्मण की आत्मकथा -२

RANJAN MISHRA ब्राह्मण की आत्मकथा -२ ब्राह्मणों ने नीव खोदी अपनी , फिर उसमे मठा डाला , और फिर चीनी , ... वो सारे उपाय किये , जिससे सर्वनाश हो सके, खुद के कुटुंब का , परिवार का , और हस्ती मिट सके सत्ता से , समाज से , और संस्कृति से . आपस की लड़ाई में , शूद्रो को राजसत्ता दिए , आरक्षण दिए , संरक्षण दिए , और चाबुक थमाया हाथो में , परिणाम आज बीबी की कमाई से , घर चलाते है और हाथियो के तलवे चाटते है , दिन-रात मेहनत कर के , रात को आधा पेट भर पाते है , बेटी,बहन और बीबी घर से बाहर जाती है और शुद्र मान -मर्दन करते है , सत्ता अब सपना है , अपमान धरोहर , अन्याय सच्चाई हैं स्वाभिमान मृग-तृष्णा .

आरक्षण ने क्या दिया ?

आरक्षण ने क्या दिया ? हमे बताओ ना, ये इतना जरुरी क्यों है ? समझाओ ना , तुमने लगाया था इसे विकास के लिए , स्वाभिमान से जी सको ,इस अधिकार के लिए , लेकिन तुमने पाया क्या ? दिखाओ ना , अन्याय हुआ है तेरे साथ ,मैं मानता हूँ तुम्हे भी आगे जाने की ललक हैं ,मैं जनता हूँ आरक्षण तेरी मांग पूरा कर पाया क्या ? बतलाओ ना आज तुम और गरीब हो गए हो , आज तेरे बंधुओं ने ही खाई खोदी हैं , वो लपक लेते है सब कुछ ऊपर से ही , और तुम खाई से देख भी नहीं पाते , तेरी भूख मिट पाई क्या ? देश को बताओ ना , मै बताता हूँ , नहीं . तेरी भूख नहीं मिटी, उलटे तुझे रोटी देने वाले भी दलिद्र हो गए , आरक्षणरूपी राक्षस ने सब कुछ लूट लिया , तुम्हारा भी ,हमारा भी आज सबकुछ भेट चढ़ गया हैं , धन-देवता के , तुम्हारा भी ,हमारा भी . लेकिन अब हम क्या करे ? वो आज भी तेरे तावे पर ही रोटी सकते है , और तेरे कुएं का पानी पीते हैं , क्या तुम विरोध कर पाओगे ? मेरा हौसला बढाओ ना , हम साथ लड़ेगे ,इन दानवों से इन आरक्षण के रखवालो से , हम जीत जाएगे ,तुम साथ तो आओ ना .

सच का सामना कर पाओगे ?

सच का सामना कर पाओगे ? झूठ बोलना बचपन से सिखा है , खून बहाना पड़ता है , व्यवस्था बदलने के लिए , शांति के लिए , सकून के लिए क्या यह कर पाओगे ? सच का सामना कर पाओगे ? अहिसा एक झूठ हैं , यह एक छलावा है , सत्ता इसे बढावा देती हैं , लूट के बचाव के लिए , फलने फूलने के लिए खाद देती है, गाँधी नहीं ,सुभाष चाहिए क्या ये कह पाओगे ? सच का सामना कर पाओगे ? अभिनेत्रियाँ रंडी होती है , नेता भारत माँ के दलाल , व्यवसायी मुनाफे के गुलाम , अफसर चापलूस और जनता नपुंसक लेकिन क्या तुम हिम्मत कर पाओगे ? सच का सामना कर पाओगे ? जिंदगी बस हारे हो तुम , गलत आदतों के गुलाम हो , तुम्हे दुसरे की फ़िक्र नहीं , स्वार्थी और निकम्मे हो , क्या तुम मुखौटा उठा पाओगे ? सच का सामना कर पाओगे ? तुम चाहते थे उसे , पागल थे तुम उसके लिए , दिन-रात उसी की बात करते थे , जान तक देने को तैयार थे तुम , लेकिन आज भी ये बता पाओगे ? सच का सामना कर पाओगे ? तुने खेला है भावनाओ से , कई लोगो का इस्तेमाल किया है , तुम मोहरा भी बने हो कई लोगो के , दुत्कारे गए हो कई दरवाजे से , और कई लोगो को तुने पिटा है और कई बार लात खाई हैं ,कई जगह लेकिन ये ...

ये मैं जानता हूँ .

फूलों को देख कर , क्यों बने है लोग चकोर , ये मैं जानता हूँ . सत्ता के गलियारों में , जूता लेकर चड़ने वालों को , मैं जानता हूँ सच का झंडा उठाये लोग, कैसे सूरजमुखी बन जाते है , ये मैं जानता हूँ . नौ शेरों पर,दस बकरियां कैसे राज करती है , ये मैं जानता हूँ . जनतंत्र ,वेश्या-तंत्र है ये मैं जानता हूँ . लूटकर देश को , पैसे कैसे विदेश जाते है , और विरोध करने पर, कैसे पिटवाते हैं ,लतियाते हैं ये मैं जानता हूँ ., अनपढ़ और गवार, जाहिल और बदमाश , बलात्कारी और हत्यारे कैसे देश चलाते हैं ये मैं जानता हूँ .

ये मैं जानता हूँ

रातो को जागते हुए, चाँद को ताकते हुए, तुम क्या होती हो, ये मैं जानता हूँ जब सब सब सो जाते है , तुम छुप -छुप के क्यों रोती हो. ये मैं जानता हूँ किसकी यादो में खोई , तुम भीड़ में निपट अकेली होती हो , ये मैं जानता हूँ सावन में बादलों को देख के , ठण्ड हवा के झोको से , तुमको कौन सी बेचैनी हैं , ये मैं जानता हूँ धरती क्यों प्यासी है , आकाश क्यों आवारा है , ये मैं जानता हूँ रंजन मिश्र

poem

(विनोद काम्बली के लिए ) जिसको मैंने भुलाया था कई सालो में , वो आज फिर मुझे रुला गयी . इन चोरो की महफ़िल में , फिर आज सच शरमा गयी . रंजन मिश्र जनतंत्र ने हमे लूट लिया वरना हम भी कभी हस्ती थे . आरक्षण ने हैं बर्बाद किया वरना हम भी कभी हस्ती थे . रंजन मिश्र तुझे देखा तो ये जाना "शमां" मुहब्बत भी हसीं होती है . तू कहाँ तक जाएगी "शमां " मैं तो हर मोड़ पर मिलूँगा . मैं आम कैसे खाऊ "शमां" उसमे भी भगवा रंग होता है . मल्लिका ने खाया गोश , पचा नहीं पाई, हो गयी बेहोश , मैंने कहा सोनिया से ट्रेनिंग लो , कैसे खाते है मंदिर का सोना , ... क्या लोगो को बताते हैं , कैसे भरमाते है , कैसे पचाते हैं , कैसे २ग का डकार लगते हैं कैसे भ्रम फैलाते है , लोगो के बोलने पर ,कैसे पिटवाते हैं . तू नाराज़ मत हो ,मैं तुझे चाँद दिला दूंगा.

सबेरा आने को हैं .

ऐ ! देख रात ख़त्म हुई सबेरा आने को हैं . ये सत्ता और गलियारे जाने को हैं . बदली छट रही ,सच आ रहा हैं , ये मातम का दौर अब जाने को हैं . ऐ ! देख रात ख़त्म हुई सबेरा आने को हैं . शहीदों की बलिदानी बेकार नहीं गयी , देख ! अपना अभिमान आने को हैं , बच्चो और बुड्डो निश्चिंत रहो , अब जवानी का उबाल आने को हैं ऐ ! देख रात ख़त्म हुई सबेरा आने को हैं . मंदिरों ,देवताओं का अपमान बहुत हुआ , फूट के बीज का अंकुरण बहुत हुआ , लूट का बाज़ार बहुत हुआ , अब इन सब पर कहर आने को है , ऐ ! देख रात ख़त्म हुई सबेरा आने को हैं . हवा अब गर्म हो गयी है , रक्त उबाल पर है , प्रचंड का आरम्भ हैं , अब क्रांति होने को हैं , ऐ ! देख रात ख़त्म हुई सबेरा आने को हैं .
लूटा बैठे तेरे इश्क में सबकुछ , अब तू मेरा क्या मोल लगाती हो . Ranjan Mishra
हम मजारे-इ- इश्क है , हमे किसका खौफ .
हम मजारे-इ- इश्क है , हमे किसका खौफ .
इश्क तो गिरफ्तारी है , जमानत कौन चाहता है कमबख्त . तुम मुस्करा के इंकार करती हो , क्या ये भी तुम्हारी अदा/aadat है ?

Reservation in India

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Reservation in India From Wikipedia, the free encyclopedia Not to be confused with Indian Reservation . Caste and community profile of people below the poverty line in India, as outlined in the Sachar Report The Reservation in India is wherein the Indian government provides Affirmative action whereby a percentage of posts are reserved in employment in Government and in the public sector units, and in all public and private educational institutions. But there is no quota system that exists in the religious/ linguistic minority educational institutions, in order to mitigate the perceived backwardness of the Other Backward Classes and the Scheduled Castes and Tribes . According to the Indian government, Scheduled Castes are those communities, that had suffered from the reputation of untouchability in some form while scheduled Tribes are generally those who have been living away from the modern civilizations and developments. [ 1 ] . The reservation policy is also extended to the Schedu...