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Showing posts from February, 2012

मानव होने का यहाँ संविधान नहीं हैं .

सभ्यता हैं ,संस्कार हैं , परम्परा और सत्कार हैं , अमन है ,आज़ाद हैं बस बोलने से पहले पूछने का प्रावधान हैं . यहाँ प्यार हैं ,भाईचारा हैं , सम्पति है ,सम्मान हैं , बस इन पर आप का अधिकार नहीं है , मानव होने का यहाँ संविधान नहीं हैं .

सच मत बोल ,it is not allowed

घोट देते हैं गला , दबा देते हैं सच , इसे कहते है आज स्वतंत्रता , इसे ही कहते है लोकतंत्र . जिसकी लाठी ,उसी की भैस , अपने-अपने दुनिया के सब लठैत , शोषण सहने को आज अनुशासन कहते है , भाई ! इसे ही लोकतंत्र का शासन कहते हैं . बाँध के गले में टाई, चमचमाते है जूता , बाप को गाली देने वाले , आज गड़ते है सभ्यता की परिभाषा .

अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच.

जब हवाएं सनसनाती हैं , रेत आसमान आसमान छेक लेते हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. धूप जब आग बनता हैं , चेहरा गोरा से काला पड़ता हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. जब बजती हैं घंटी , शांति भंग हो जाती हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. पेड़ के नाम पर बबूल दीखते हैं , और जमीन की जगह रेत , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. जब प्यास लगती हैं , और पानी नहीं मिलता , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. आंसू आँखों में ही सूख जाते हैं , दर्द कुह्कते रहते हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. रात को जब नींद खुलती, बत्ती जलते हुए मिलती है , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच.

तन्हाई और रात

तन्हाई और रात सुलगती सांसे , दहकते अंगार , मोम के टीले पर बसी , तन्हाई और ये रात. अंगूर ,भींगी-भींगी खुशबू , अल्हड ,मदमस्त ,बेकाबू , नशे के गोद में बैठी , तन्हाई और ये रात. आँखों की डोर , कबूतरों का शोर , चाहत की अंगड़ाई में सनी , तन्हाई और ये रात. . बसन्त ,ये बारिष, यौवन का तूफ़ान , जलती आग में घी बनी , तन्हाई और ये रात. चल ,यूँ ही चलते रहो , गीली जमीन पर बड़ते रहो , बेकाबू हुए आकाश में , तन्हाई और ये रात.