पहाड़ को पिघलाउंगा मैं
ये पहाड़ जो खड़ा है गुनाहों का हैं , ये झाड़ उनके सिपलहारो का हैं , मोमबती जो जनता का हैं , अब इसे जलाऊंगा मैं , और पहाड़ को पिघलाउंगा मैं . ये समुन्द्र जो शांत हैं सब्र का हैं , ये नदी जो इसमें मिलती है कष्ट का हैं , ये हिम जो जनता का हैं , अब इसे गरमा उंगा मैं, और समुन्द्र में भूचाल लाऊंगा मैं .