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Showing posts from April, 2012

पहाड़ को पिघलाउंगा मैं

ये पहाड़ जो खड़ा है गुनाहों का हैं , ये झाड़ उनके सिपलहारो का हैं , मोमबती जो जनता का हैं , अब इसे जलाऊंगा मैं , और पहाड़ को पिघलाउंगा मैं . ये समुन्द्र जो शांत हैं सब्र का हैं , ये नदी जो इसमें मिलती है कष्ट का हैं , ये हिम जो जनता का हैं , अब इसे गरमा उंगा मैं, और समुन्द्र में भूचाल लाऊंगा मैं .

बड़ी बेआबरू होकर कुचे से आज निकला

(अभिषेक मनु सिघवी पर एक कविता .पसंद आये तो अपने दाद जरुर दे ) उसके ठहाको के शोर में दबा तूफ़ान था , जिसकी आहट से ही उसका जनाज़ा निकला . रातभर करता रहा बखान अपनी जिन्दगी का , सुबह अख़बार में उसके खुदखुशी का खबर निकला . बैठ कर बादलो पर फिरता था आसमान में , बारिश आई तो बन के नाली का कीड़ा निकला . शब्दों के सियासत से शीर्ष पर पंहुचा , बड़ी बेआबरू होकर कुचे से आज निकला . घुमा करता था सच की लिवाज़ पहन कर , या खुदा ! आज वही झूठ का घरोंदा निकला . बैठा था जिस तख़्त पर वर्षो से वो , आज वही बन कर रेत का बुरादा निकला . रंजन मिश्र ...............रंजन मिश्र

तुम कमज़ोर नहीं थे ,तुम नामर्द थे .

तुम गवाह हो ! बताना अपने बच्चो को , कैसे लूटा गया तुम्हारा खेत , कैसे बेआबरू किया गया , तुम्हे,तुम्हारी मिटटी से , और तुम खड़े ताली बजाते रहे , कुछ बेवकूफ सर कलम कराते रहे , तुम कलमधारी पैसे कमाते रहे , खून पानी न हुआ हो तो बताना , तुम कमज़ोर नहीं थे ,तुम नामर्द थे . Copyright@ Ranjan Mishra