जो रूठ जाते हैं वो आशिक़ नहीं होते, अपने आशिक़ से से तो रूठा ही नहीं जाता . ये जवां हसीं तुम कितना सितम करेगी , अब तेरा सितम सहा नहीं जाता . तेरी हंसी मेरे खून में घूल गयी हैं , अब खून तो रोज़ -रोज़ बदला नहीं जाता . तेरे रोज़ के इनकार से आजिज हो गया हूँ , तेरा रोज़ का बहाना अब सुना नहीं जाता . तेरे हुस्न के जाल में इस तरह से फंस गया हूँ मैं , लाख कोसिसों से अब निकला नहीं जाता .
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Showing posts from March, 2013
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अब तुम्हे मैं क्या कहूँ ? तुम्हारे गाली पर भी लोग ताली बजाते हैं . जीत गए जुआ तो चीरहरण भी जायज हैं , वाह रे! जम्होरिअत हम तुम्हारा लोहा मानते हैं . खुदा भी खौफ खाता हैं इन हुक्मरानों से , मौत के सौदागर जो ये ठहरे . जिन्हें जिम्मेदारी थी मुझे जिन्दा रखने की , वही मेरे सांसो के खरीदार निकले . जो हुस्न के मालिक हैं वो दिल की भाषा कहाँ समझते हैं , और जो दिलवाले हैं उन्हें सौगाते हुस्न नहीं मिलता .
फागुन के कइके करार बलमुआ ना आओ
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फागुन के कइके करार बलमुआ ना आओ , ना आओ हो .....ना आओ , फागुन के कइके करार बलमुआ ना आओ, कहले रहले की लालका पोतम , अरे नाहि लगइले गुलाल , बलमुआ ना आओ .......ना आओ ....हो ना आओ फागुन के कइके करार बलमुआ ना आओ , ना आओ हो .....ना आओ। कहले रहले की दिल में बसाईब,दिलवा भइल उदास , बलमुआ ना आओ .......ना आओ ....हो ना आओ , फागुन में कईसे कटी अब रतिया , बिछौना भइल दिल काल , बलमुआ ना आओ .......ना आओ ....हो ना आओ , फागुन के कइके करार बलमुआ ना आओ।
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एक कसक -सी उठती हैं , कुलबुलाते बुलबुले की तरह , वाष्प बनकर उड़ जाती हैं , जैसे आई थी उसी तरह . मैं रोकना चाहता हूँ , लेकिन वो रूकती कहाँ हैं , ये तितली इतनी सुंदर हैं , लेकिन फूलों पर झुकती कहाँ हैं ? सूर्य में इतनी तेज़ रोशनी हैं , लेकिन आँखें सामने टिकती कहाँ हैं ? मैं तो उसके कानों में कहना चाहता हूँ , लेकिन ये हिरणी सुनती कहाँ हैं ? एक चोट ,एक भय हैं , जो पकते रहता हैं धीरे -धीरे , अंदर इतना ताप छुपा हैं , लेकिन ज्वाला उठती कहाँ हैं ? Copyright@Sankalp Mishra