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Showing posts from February, 2017
राजनीति क्या हैं ? आदमी को खको में बाँटने की काबिलियत , या उसे अपने पाले में खड़े करने का पराक्रम , आखिर क्या हैं राजनीति ? लाल झंडे गाड़ कर जमीन हथिया लेना , या आरक्षण की रेवड़ी बाँट देना ? किसे कहेंगे राजनीति ? दंगे करवा कर अनसन करने का ढोंग , राजनीति हैं ? या आगजनी ,दंगे पर मौन रह जाना , राजनीति हैं ? राजनीति क्या हैं ? देश में देश के खिलाफ नारे लगाना , या देश में देश के खिलाफ इंकलाब , क्या हैं राजनीति ? गरीबो को बरगाला कर हथियार देना , या विकास का नारा देकर , गरीबो ,आदिवासियों का जमीन हथिया लेना , क्या हैं राजनीति ? धर्म की लकीर खींचकर देश बाँट देना , या जाति की लकीर खींचकर समाज बाँट देना , क्या हैं राजनीति ? अमीर को और अमीर बनते जाना , या दो जून की रोटी के लिए , इंसानों  को जानवरों से बदतर बना देना, किसे कहेंगे राजनीति आप ? पूंजीपतियों के जेब में बैठी सरकार के लिए , या ज्यादा जनसँख्या वाले जाति के लिए , बहुत दूर आत्महत्या करते किसान के लिए ? या पढ़-लिख कर बेरोजगार बैठे जवान के लिए , क्या हैं राजनीती ? एक सपना जो पूरा नहीं होगा ? या मृगतृणा ? या चि...
देशभक्ति क्या हैं ? एक सैनिक की जवान बीबी को बेवा कर देना , या अबोध बच्चे को अनाथ कर देना , या किशोरो को बरगला कर हथियार थमा देना , समय के साथ आदमी का मज़दूर बनते जाना , या सब कुछ के मालिक चंद लोगो का हो जाना , क्या हैं देशभक्ति ? कोर्ट परिसर में किसी को लतिया देना , या  रोमियो - सुधार दल बना देना , हमारे जिंदगी पर पूर्ण नियंत्रण देशभक्ति हैं , या रोटी देने से पहले टैक्स वसूलता देशभक्ति हैं , क्या हैं देशभक्ति ? सदियों से गरीब और गुलाम बनाये रखना , या क्षेत्र , धर्म , जाति आदि के खाको में बाँटना , लगातार सपने की खेती करते जाना , या हर बार बेचने का नया तरीका अपनाना , हर बार जुमले बेचना देशभक्ति हैं , या अमीरों का सत्ता को रखैल बनाना  देशभक्ति हैं , या गरीबों का सत्ता की गुलामी देशभक्ति हैं , क्या हैं देशभक्ति ? दूर गाँव में आत्महत्या करते किसान के लिए , रोजगार के लिए भटकते नौजवान के लिए , आरक्षण की मार झेलते समाज के लिए , जल -जमीन- जंगल को शहरी भेडियो से बचाने के लिए संघर्षरत आदिवासी नौजवान के लिए , आदमी की आज़ादी के लिए लड़ते लोगो के लिए , क्या हैं देशभक...
यह सड़क हैं या चौराहा हैं ? लगता तो इंसान हैं दिखता मगर साया हैं , यकीं तो आज भी हैं इस शख्स पर , लेकिन कहना पड़ेगा ' आदमी ' बेचारा हैं । मंजिल जब मालुम न हो , राह कौन सही हैं ? कंधे पर उठा लिए हैं बोझ बहुत सारा , और पैर को मालूम नहीं हैं , यह सड़क हैं या चौराहा हैं ? लगता तो इंसान हैं दिखता मगर साया हैं | Copyright@Sankalp Mishra