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Youth Curry - Insight on Indian Youth: Do you have a Bloody Good Book in you?

Youth Curry - Insight on Indian Youth: Do you have a Bloody Good Book in you? : An invitation to first time authors Many of you write to me, asking for advice on how to get published. Often you say, “I have a manuscri...

एक आदमी को लाला की गुलामी करते हुए देखा

मैंने एक कुत्ते को हड्डी चबाते हुये देखा  या एक आदमी को लाला की गुलामी करते हुए देखा , ना पेट भरा ना मन भरा , मैंने बस दुम हिलाते हुए देखा , अजब मज़बूर हैं आदमी  कि उसे दूसरे की मज़बूरी का फायदा उठाते हुए देखा , जो काम करता हैं उसको काम के बोझ से दबते हुए देखा , और जो चापलूसी करते हैं उसको आगे बढ़ते देखा , जब एक आदमी आगे बढ़ता हैं  तो उसके ऊपर वाले को भय के साये में जीते देखा , अपनी कुर्सी को मज़बूत करने के लिए , लोगो को लोगो को बदनाम करते देखा। सच क्या हैं फर्क नहीं पड़ता ,

भारत -पूत अब विश्व -गुरु बन जायेंगे

पहाड़ टूट जायेंगे ,समुन्द्र सुख जायेंगे , रण -भूमि में जब युवा दहाड़ लगायेंगे , सपने का भारत राम -राज्य अब लायेंगे , वीर -भोग्य -वसुंधरा भारत को बनायेंगे, आज ओज -तेज़ से धरती को चमकाएंगे , भारत -पूत अब विश्व -गुरु बन जायेंगे। 

हाथ में तिरंगा ,माँ -भारती के गीत गाये जा

रुको ना तुम ,झुको ना तुम दौड़ तुम लगाये जा , हाथ में तिरंगा ,माँ -भारती के गीत गाये जा , आज तेरे सपने ,आज तेरी जीत हैं , एक -एक कदम हर क्षण तुम बढ़ाए जा , विश्व इंतजार में तेरे आदेश का , अब तिरंगे को विश्व -पटल पर सजाये जा , ज्ञान -धर्म -उपदेश -बल सब तेरे साथ हैं , हाथ में तिरंगा ,दहाड़ तू लगाये जा, रुको ना तुम ,झुको ना तुम दौड़ तुम लगाये जा , हाथ में तिरंगा ,माँ -भारती के गीत गाये जा

जिंदगी के दौड़ में मैदान में खड़े रह

जिंदगी के दौड़ में मैदान में खड़े रह , जीत हो हार हो फ़ैसले पर अड़े रह , वक़्त के साथ पत्थर भी घिस जाता हैं , दिव्य संतान बस तुम युद्ध में भिड़े रह।  हौसले जीत की नींव बन जाती हैं , गर्म ख़ून ही तलवार उठाती हैं , शौर्य -धौर्य एक साथ मिशाल बन जाती हैं , आलस त्याग रण -भूमि में कूद पड़ , जिंदगी के दौड़ में मैदान में खड़े रह , जीत हो हार हो फ़ैसले पर अड़े रह.

मै हूँ की मुखौटा हूँ

मै हूँ की मुखौटा हूँ , कालकोठरी में हूँ , दृष्टिगोचर चौतरफा हूँ , समय के साथ वृक्ष बना हूँ , या की मैं पौधा हूँ , मै हूँ की मुखौटा हूँ। 
तुम हो या चली गयी ये बतलायेगा कौन , अनसुलझे प्रश्नो को सुलझायेगा कौन , घंटो बातों का कोई अर्थ नहीं निकला , या हमारे सम्बन्धों का पैर नहीं निकला , कुछ तो कही कमी रह गयी हैं भँवरे में , कि फूलों से अबतक शहद नहीं निकला। मैं मुहब्बत के पीर को समझाऊ भी तो कैसे , इस बार तो दरिया से भी पानी नहीं निकला। इन रातो का भी खूब शगल था दोस्तों , दर्द जब सबसे ज्यादा था  सहर नहीं निकला।