तुम हो या चली गयी ये बतलायेगा कौन ,
अनसुलझे प्रश्नो को सुलझायेगा कौन ,
घंटो बातों का कोई अर्थ नहीं निकला ,
या हमारे सम्बन्धों का पैर नहीं निकला ,
कुछ तो कही कमी रह गयी हैं भँवरे में ,
कि फूलों से अबतक शहद नहीं निकला।
मैं मुहब्बत के पीर को समझाऊ भी तो कैसे ,
इस बार तो दरिया से भी पानी नहीं निकला।
इन रातो का भी खूब शगल था दोस्तों ,
दर्द जब सबसे ज्यादा था  सहर नहीं निकला।   

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