कवि मरता नहीं हैं

कवि मरता नहीं हैं ,
कवि को मरना भी नहीं चाहिए ,
तब भी नहीं जब साँसे रुक जाए ,
तब भी नहीं जब साँसे चल रही हो ,
कवि हमेशा जिन्दा रहता हैं ,
शब्दों में ,
आपके दिलों में ,
खेत- खलिहानों में ,
बाज़ार में ,
दूकान में ,
आपके मकान में
आपके पलंग पर ,
आपके तकिये के नीचे ,
आपके उस फूल में जो प्रेमिका को देते हैं ,
उस गाली में जो मज़दूरों को देते हैं ,
कवि हमेशा जिन्दा रहता हैं ,
कवि मरता  नहीं हैं ।

कवि जिन्दा रहता हैं ,
माँ के क्रंदन में ,
बच्चे के किलकारी में ,
युवा के आक्रोश में  ,
बुजुर्ग के अफ़सोस में ,
आपके उल्लास में ,
आपके टीस में ,
आपके सपने में ,
आपके यात्रा में ,
आपके गंतव्य में ,
कवि जिन्दा रहता हैं ,
कवि मरता नहीं हैं ।

कवि जिन्दा रहता हैं ,
उस आवाज में जो सत्ता के खिलाफ होता हैं ,
अहंकार और  नाकाबिलियात के खिलाफ होता हैं ,
उस आवाज में जो गूंगी जनता बोलती हैं ,
उस आवाज में जो ताकतवर सुनना चाहते है ,
उस आवाज में जो दबाई जाती हैं ,
उस आवाज में भी जो पतंग पर चढाई जाती हैं  ,
उस आवाज में जो शहरों के शोर में दब जाता हैं ,
उस आवाज में भी जो गांवों में घूंट रही हैं ,
उस आवाज में भी जो टीवी पर सुनाई जाती हैं ,
उस आवाज में भी जिसका कोई सुनने वाला नहीं हैं ,
कवि जिन्दा रहता हैं ,
कवि मरता नही हैं ।

कवि जिन्दा रहता हैं
तब जब सब डर कर चुप हो जाते हैं ,
तब जब सब बिकने को तैयार हो जाते हैं ,
तब जब सब कुछ अच्छा दिखाया जाता हैं ,
तब जब बदरंग को छुपाया जाता हैं ,
तब जब आज़ादी बिकने लगती है ,
तब भी जब सच्चाई झुकने लगती हैं ,
तब जब पैसावाला सबकुछ हो जाता हैं ,
तब भी  जब आदमी मज़बूर हो जाता हैं ,
तब जब धर्म आदमी से बड़ा हो जाता हैं ,
और तब भी जब ज़मीन पर खिंची लकीर खून से सस्ता हो जाता हैं ,
कवि जिन्दा रहता हैं ,
कवि मरता नहीं हैं ।

कवि जिन्दा रहता हैं
तब जब जेब में फूटी कौड़ी न हो ,
दूर- दूर तक सगे- संबधी न हो ,
तब भी जब भगवान रूठा- रूठा हो ,
और रास्ते सबके जुदा हो ,
तब जब लोग मिलने से कतराते हो ,
और दो कौड़ी के लोग चिढ़ाते हो ,
तब जब आगे दूर तक अँधेरा हो ,
और एकलौता हाथ का चिराग बुझ जाए ,
तब भी कवि जिन्दा रहता हैं ,
कवि मरता नहीं हैं ।

Copyright@Sankalp Mishra

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