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Showing posts from February, 2020
अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. जब हवाएं सनसनाती हैं , रेत  आसमान छेक लेते हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. धूप जब आग बनता हैं , चेहरा गोरा से काला पड़ता हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. जब बजती हैं घंटी , शांति भंग हो जाती हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. पेड़ के नाम पर बबूल दीखते हैं , और जमीन की जगह रेत , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. जब प्यास लगती हैं , और पानी नहीं मिलता , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. आंसू आँखों में ही सूख जाते हैं , दर्द कुह्कते रहते हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. रात को जब नींद खुलती, बत्ती जलते हुए मिलती है , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. Copyright@Sankalp Mishra
आम आदमी और राजनीति .......................................... असंख्य लोग तैयार हैं समर्थन के लिए , धन और वोट देने के लिए , तेरीआवाज पर झंडा उठाने के लिए , लोग परिवर्तन के लिए तैयार हैं , लेकिन तुम नहीं आओगे , तुम नेता नहीं बनोगे , तुम्हारा अपना परिवार हैं , तुम्हे जो जून की रोटी कमानी हैं , तुम्हारी मज़बूरी हैं नौकरी करना , तुम नहीं आओगे ? फिर कौन आएगा ? और अगर तुम नहीं आओगे , तो क्या तुम्हे अधिकार हैं ? प्रश्न करने का ? भ्रष्ट नेताओं पर, भ्रष्ट अधिकारी और न्यायपालिका पर , शोषण और अत्याचार पर , दो कौड़ी के सरकार पर , नहीं |तुम्हे अधिकार नहीं । तुम अगर गन्दगी साफ़ नहीं करते , तो बंद कमरे में भाषण मत करो , तुम्हे अगर नेता नहीं बनना , तो फिर सहो चुपचाप , जो भी हो रहा हैं सहो । चुपचाप । तुम आम आदमी इसी लायक हो । तुम्हे भगत सिंह चाहिए लेकिन वो पडोसी होना चाहिए , तो सुनो आम आदमी , तुम इसी लायक हो , जो भी तुम्हारे साथ हो रहा हैं , बिलकुल सही हो रहा हैं , तुम इसी के लायक हो । Copyright@Sankalp Mishra
चार पैसे ज्यादा मिला जो तुरंत निकल गया , उसकी जय - जयकार होते देखिए , जो अपने वादे को निभाने को कटिबद्ध हैं , उसको रोज अपमानित होते देखिए । अजीब दुनियां हैं इसके तरीके भी निराले हैं , जो सच के लिए लड़ता रहा अकेला रह गया , और जो झूठ पर झूठ बोलता रहा हर कदम , उसको अब  बुलंदी का गीत गाते हुए देखिए । जो उसके कंधे पर पैर रख कर ऊपर चढ गया , उसी को उसका झंडा लहराते हुए देखिए , जो नमक आदयगी का रट लगाए लड़ता रहा , उसी पर सारे " लांछन " लगते हुए देखिए । किताबों में पढ़ाया गया सच की  जीत होती है , सच के धरातल पर इसे जुमला बनते देखिए , जो आगे जाने के लिए कुछ भी कर सकता है , उसको बुलंदी का खिताब लेते हुए देखिए । Copyright@Sankalp Mishra
असल जिंदगी में , जो इंसान सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है , वहीं सबसे ज्यादा बदनाम होता है , इस्तेमाल होते वक्त वो जान नहीं पाता , इस्तेमाल होने के बाद बता नहीं पाता , शतरंज के खिलाड़ी जीतकर खामोश रहते हैं , प्रवक्ता बने प्यादे शहीद होते हैं , लेकिन हर कहानी के अंत में मालूम चल ही जाता है , कृष्ण कौन , अर्जुन कौन ,दुर्योधन , शकुनि कौन हैं और कौन कर्ण और कौन एकलव्य हुए हैं , लेकिन सच ये है कि नाटक ख़तम होने पर ही , सभी पात्रों का चरित्र सामने आता है , किसने क्या किया ये पता चल पाता हैं । Copyright@Sankalp Mishra