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तुम आत्महत्या मत करना

तुम आत्महत्या मत करना , अपने पर विश्वास करना , जब परिवार तुम्हे छोड़ दे , और सगे सम्बन्धी कतराने लगे , कोई मित्र  तुम्हारा   साथ न दे , और सारे पड़ोसी तुमसे रूठ जाये , तब भी   तुम आत्महत्या मत करना , अपने पर विश्वास करना . जब   तुम्हारे आँखों के सामने अँधेरा हो , और कोई रास्ता दिखाई न दे , मंजिल कोई निश्चित न हो , और पांव भी थकने लगे , तब भी   तुम आत्महत्या मत करना , अपने पर विश्वास करना . जब तुम्हारा ग्रह-नक्षत्र  बिगड़ जाये , और भाग्य कुठाराघात करने लगे , समय   तुम्हारे अनुकूल न हो , और विपति तुम्हे एक साथ घेर ले , तब भी   तुम आत्महत्या मत करना , अपने पर विश्वास करना . तुम्हारे कमाई का साधन बंद हो जाये , और जमा पूंजी ख़त्म हो जाये , अचल सम्पति बिक जाये , और कही से कोई उधार न मिले , तब भी   तुम आत्महत्या मत करना , अपने पर विश्वास करना . तुम्हारे चरित्र पर हज़ार लांछन लग जाये , और समाज तुमको नकार दे , तुम्हारे नाम पर अखबार में मशाला बने , और तुम्हारे अपने तुम्हे धिक्कार दे , तब भी ...

अगर सिकंदर को पहले रोका होता

अगर  सिकंदर  को पहले रोका होता , तो आज हमारा खून साफ़ होता ? लंगोट नीलाम न होता , और मस्तक गुलाम न होता , हम हर बार देर से जागे , लेकिन तब तक हमारा मान-मर्दन हो चूका होता , हमारी धरती लूट चुकी होती , और जनता टूट  चुकी होती , अगर  सिकंदर  को पहले रोका होता , तो आज हमारा खून साफ़ होता ? हम हर बार लड़े हैं , हम हर बार जीते हैं , लेकिन तब जब कुछ नहीं बचा होता , यह कविता कुंठित नहीं , चेतावनी हैं , तुम आज फिर सो रहे हो , भोग -विलाश में खो रहे हो , एक अँगरेज़ फिर व्यापार करने आया हैं , कल मत कहना कोई तो चेताया होता , भविष्य के खतरे को समझाया होता हैं , अगर  सिकंदर  को पहले रोका होता , तो आज हमारा खून साफ़ होता ?    

सब्जी मंडी या की रंडी हो गयी हैं जनतंत्र ?

सब्जी मंडी या की रंडी हो गयी हैं जनतंत्र ? विदेशी लूटेरों की कुंजी हो गयी हैं जनतंत्र , या के  सत्ता के पहलवानों की पूंजी हो गयी हैं जनतंत्र ? बड़े -बड़े महलों के आगे झुंगी हो गयी हैं जनतंत्र , या बचपन के मदारी की डुगडुगी हो गयी हैं जनतंत्र ? सब्जी मंडी या की रंडी हो गयी हैं जनतंत्र ? ताकत और पैसे की संगी हो  गयी है जनतंत्र , या मियां हलीम की लुंगी हो गयी हैं जनतंत्र ? हिमालय के आगे छोटी हो गयी हैं जनतंत्र , या भारत के विद्वानों की पोथी हो गयी हैं जनतंत्र ? कुते की बोटी हो गयी हैं जनतंत्र , या पहलवानों की लंगोटी हो गयी हैं जनतंत्र ? सब्जी मंडी या की रंडी हो गयी हैं जनतंत्र ?

गाज़ियाबाद में लाशें बिछी हैं , आज वो कहाँ हैं ?

गाज़ियाबाद  में लाशें बिछी हैं , आज वो कहाँ हैं ? जिन्हें फ़िक्र थी मानवता , जो जीते थे जनतंत्र के लिए , सेकुलर होने की रोटी खाने वाले , आज वो कहाँ हैं ? गाज़ियाबाद  में लाशें बिछी हैं , आज वो कहाँ हैं ? जिन्हें अन्याय ,अत्याचार पचता नहीं , गुजरात पर जिनके कलम थकते नहीं , असम के कलंक पर मौन रहने वालों , आज आत्मा की आवाज़ कहाँ हैं ? गाज़ियाबाद  में लाशें बिछी हैं , आज वो कहाँ हैं ? नहरें मौत की कब्रगाह बनी हैं , और औरतें हवस की शिकार , आग के हवाले हुए हैं नागरिक और सिपाही , दहशतगर्दो  को समझाने वाले , सच का झंडा उठाने वाले , आज वो कहाँ हैं ? गाज़ियाबाद  में लाशें बिछी हैं , आज वो कहाँ हैं ?
द्रौपदी के चीरहरण पर तुम मौन हो, पूछते क्यों नहीं खुद से तुम कौन हो ? नदियाँ बही थी खून की इसी धरती पर , भूमि के लिए जान देने वाले या कुछ और हो . तुम अभागे अर्जुन या की कर्ण हो , अमेरिका कृष्ण या शकुनी सोनिया हो ,  पूछते क्यों नहीं खुद से तुम कौन हो ? लड़ रहा हैं एक वृद्ध सच के लिए , डंका के चोट पर तुम बोल दो , अब हम या ये तख़्त रहेगा , उठ रही हर गली के लहू की पुकार है ये , द्रौपदी के चीरहरण पर तुम मौन हो, पूछते क्यों नहीं खुद से तुम कौन हो ? Copyright@Ranjan Mishra
अँधेरा जब हद से ज्यादा हो , रोशनी कराई जाती हैं  धुप से बचने के लिए ,झोपडी बनाई जाती हैं , आज के नेता इतने व्यस्त हैं देश सेवा में , उनके संतानों की गिनती कोर्ट से कराई जाती हैं . Copyright@Ranjan Mishra
सुशासन की जय हो ......(bhojpuri kavita) बिलार के भागी सिकहर तुटत बा , अन्ना के माथे भाजपा मज़ा लूटत ता , परवल के जूस पिए के उ कहत रहे , इ भूरा बाल साफ़ कर के देखावत बा . छोट छोट बात के बतंगड़ बनावत बा , दुनिया के सब दोष बढजतियन पर आवत बा , उ अज्ञानी बनवलस,इ शराबी बनावत बा , इ लौलीपोप खिया के सब के भरमावत बा , हाय रे लोग ! तू लोग केतना अभागा होए , गढ़ाहा से निकल के कुआँ में गिरत बा . Copyright@Ranjan Mishra