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गिद्ध कर रहे लाशों की रखवाली

 गिद्ध कर रहे लाशों की रखवाली हैं,  देख भाई रामराज्य में आई महामारी हैं ।  नेता, अफ़सर, व्यापारी सब लगे हुए है नोचने में,  चौकीदार समझ सता सौपी वो बना हुआ दरबारी हैं ।  सौगंध मुझे इस मिट्टी की देश नहीं बिकने दूंगा,  कह कर राजा बने थे आज कर रहे दलाली हैं  ।

Dar lagta hai

अब तो डर लगता है बोलने से भी इस राज में , श्रीराम बोलकर ना जाने कौन गोली मार दे बाद में । सच , न्याय , समानता सब बकवास है इस राज में , वन्दे मातरम् , जय श्रीराम बाकी सब कुछ बाद में । गाय , बकरी , भेड़ , सुवर सब पर जोर इस राज में  रोटी , रोजगार , शिक्षा , सुरक्षा सब कुछ होगा बाद में । कोर्ट कचहरी अफसर सरकार कोई काम न आएगा , अब तो सड़क पर भीड़ फैसला करेगी इस राज में । Copyright@Sankalp Mishra

Chunaw hai

सड़कों पर लाशों का अंबार देखा हैं,  करोना काल में देश में चुनाव देखा हैं ।  कितनी सस्ती हैं जिंदगी सरहदों पर देखा हैं,  जब भी चुनाव आया सैनिकों को शहीद होते देखा हैं ।  राष्ट्रवाद को मैंने इसी देश में हथियार बनने देखा हैं ,  जब भी चुनाव आया मौत को त्यौहार बनते देखा हैं ।  कौन कहता हैं लोग बिना आँख के बिना अंधे होते हैं,  मैंने जब भी चुनाव आया लोगो को अंधे होते देखा हैं ।  Copyright@Sankalp Mishra
तकलीफ़ क्या हैं ये मुझे बताइये , शर्त हैं लेकिन पहले मुस्कराइये । गांठ सारे खुद ही  खुल जाएंगे , शर्त हैं लेकिन नाकाब तो हटाइये । आपकी तन्हाई दूर हो जायेगी , शर्त हैं लेकिन पहले हाथ तो बढाइये । Copyright@Sankalp Mishra
सच को सच लिख सके अब वो अखबार कहाँ ,  अपनी आँखों से सच देख सके वो अब वो इंसान कहाँ,  प्रोग्राम बन गए हैं लोग ब्रॉडकास्ट होने वाले,  खुद के आँख, नाक, कान, दिमाग वाले अब इंसान कहाँ  ।  Copyright@Sankalp Mishra
हिंदू का घर जला हैं , मुस्लिम का आशियाना उजड़ा हैं आइए मिलकर फिर विश्वास जगाते हैं , दुनियां को और बेहतर बनाते हैं , हलीम चाचा गाड़ी चलाते थे , गुड्डू भैया सब्जी की ढेली लगाते थे , इन दोनों ने अपने संतान को खोया हैं , वापिस तो नहीं आएंगे इनके लाड़ले , आइए हम इनके दुखो पर मलहम लगाते हैं , आइए मिलकर विश्वास जगाते हैं , दुनियां को और बेहतर बनाते हैं ।। दोषी न मोटा भाई हैं न मूला जी , दोष हम सब के समझदारी का हैं , वो महलों में बैठ विष बीते हैं , दोष उन बीजों के पहरेदारी का हैं , हम सींचते हैं उनके नफ़रत को , रोज विषबेल में खाद पानी डालते हैं , उनके न घर जले , न मातम पसरा आंगन में , दोष हम सब के नादानी का हैं , आइए मिलकर फिर विश्वास जगाते हैं , दुनियां को और बेहतर बनाते हैं ।। Copyright@Sankalp Mishra
अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. जब हवाएं सनसनाती हैं , रेत  आसमान छेक लेते हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. धूप जब आग बनता हैं , चेहरा गोरा से काला पड़ता हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. जब बजती हैं घंटी , शांति भंग हो जाती हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. पेड़ के नाम पर बबूल दीखते हैं , और जमीन की जगह रेत , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. जब प्यास लगती हैं , और पानी नहीं मिलता , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. आंसू आँखों में ही सूख जाते हैं , दर्द कुह्कते रहते हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. रात को जब नींद खुलती, बत्ती जलते हुए मिलती है , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. Copyright@Sankalp Mishra