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Showing posts from 2020

Tum kaun ho ?

 तुम कौन हो ? चुपके से मुझे बता दो , मैं किसी को नहीं बताऊंगा , विश्वास करो , मैं तुम्हारी तरह गिरगिट नहीं । न तुम ईमानदार हो , ना देशभक्त , तुम्हे न अपनी चिंता हैं , और न जनता की , तुम्हे न परिवार की चिंता हैं , और न पार्टी की , सब डरे हुए हैं , सब परेशान है , बहुत मर गए , बहुत मरने के कगार पर हैं , बताओ न तुम कौन हो ? क्या चाहते हो ? भगवान हो ? या बनना चाहते हो ? दलाल हो ? पर किसके ? या शैतान हो ? पर क्यों ? या कोई सनकी पागल हो ? बता दो न , करोड़ो लोग ,लाखो गांव , हज़ारो शहर , बस तुम्हारी वजह से , दिन -रात , सुबह - शाम , सब कुछ छोड़छाड़ कर , तुम्हे झेल रहे हैं , बता तो दो आखिर तुम हो कौन ? चलो अपनी नहीं तो लोगो की , खता बता दो , हज़ारो लोग इलाज बिना मर गए , जिम्मेदार कौन बता दो , कुछ तो बताओ , या केवल भाषण दोगे ? जनता कराह रही हैं , त्राहिमाम -त्राहिमाम कर रही हैं , पता नहीं तुम किस मद में हो , न दिखाई दे रहा हैं , न सुनाई दे रहा हैं , ऐसा तो रावण भी न था , ऐसा कंश भी न रहा होगा , न दया , माया , न पात्रता , न सोच , न समाधान , कौन हो  कहाँ से आये ही बता दो न , चुपके से मुझे ,मैं क...

गिद्ध कर रहे लाशों की रखवाली

 गिद्ध कर रहे लाशों की रखवाली हैं,  देख भाई रामराज्य में आई महामारी हैं ।  नेता, अफ़सर, व्यापारी सब लगे हुए है नोचने में,  चौकीदार समझ सता सौपी वो बना हुआ दरबारी हैं ।  सौगंध मुझे इस मिट्टी की देश नहीं बिकने दूंगा,  कह कर राजा बने थे आज कर रहे दलाली हैं  ।

Dar lagta hai

अब तो डर लगता है बोलने से भी इस राज में , श्रीराम बोलकर ना जाने कौन गोली मार दे बाद में । सच , न्याय , समानता सब बकवास है इस राज में , वन्दे मातरम् , जय श्रीराम बाकी सब कुछ बाद में । गाय , बकरी , भेड़ , सुवर सब पर जोर इस राज में  रोटी , रोजगार , शिक्षा , सुरक्षा सब कुछ होगा बाद में । कोर्ट कचहरी अफसर सरकार कोई काम न आएगा , अब तो सड़क पर भीड़ फैसला करेगी इस राज में । Copyright@Sankalp Mishra

Chunaw hai

सड़कों पर लाशों का अंबार देखा हैं,  करोना काल में देश में चुनाव देखा हैं ।  कितनी सस्ती हैं जिंदगी सरहदों पर देखा हैं,  जब भी चुनाव आया सैनिकों को शहीद होते देखा हैं ।  राष्ट्रवाद को मैंने इसी देश में हथियार बनने देखा हैं ,  जब भी चुनाव आया मौत को त्यौहार बनते देखा हैं ।  कौन कहता हैं लोग बिना आँख के बिना अंधे होते हैं,  मैंने जब भी चुनाव आया लोगो को अंधे होते देखा हैं ।  Copyright@Sankalp Mishra
तकलीफ़ क्या हैं ये मुझे बताइये , शर्त हैं लेकिन पहले मुस्कराइये । गांठ सारे खुद ही  खुल जाएंगे , शर्त हैं लेकिन नाकाब तो हटाइये । आपकी तन्हाई दूर हो जायेगी , शर्त हैं लेकिन पहले हाथ तो बढाइये । Copyright@Sankalp Mishra
सच को सच लिख सके अब वो अखबार कहाँ ,  अपनी आँखों से सच देख सके वो अब वो इंसान कहाँ,  प्रोग्राम बन गए हैं लोग ब्रॉडकास्ट होने वाले,  खुद के आँख, नाक, कान, दिमाग वाले अब इंसान कहाँ  ।  Copyright@Sankalp Mishra
हिंदू का घर जला हैं , मुस्लिम का आशियाना उजड़ा हैं आइए मिलकर फिर विश्वास जगाते हैं , दुनियां को और बेहतर बनाते हैं , हलीम चाचा गाड़ी चलाते थे , गुड्डू भैया सब्जी की ढेली लगाते थे , इन दोनों ने अपने संतान को खोया हैं , वापिस तो नहीं आएंगे इनके लाड़ले , आइए हम इनके दुखो पर मलहम लगाते हैं , आइए मिलकर विश्वास जगाते हैं , दुनियां को और बेहतर बनाते हैं ।। दोषी न मोटा भाई हैं न मूला जी , दोष हम सब के समझदारी का हैं , वो महलों में बैठ विष बीते हैं , दोष उन बीजों के पहरेदारी का हैं , हम सींचते हैं उनके नफ़रत को , रोज विषबेल में खाद पानी डालते हैं , उनके न घर जले , न मातम पसरा आंगन में , दोष हम सब के नादानी का हैं , आइए मिलकर फिर विश्वास जगाते हैं , दुनियां को और बेहतर बनाते हैं ।। Copyright@Sankalp Mishra
अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. जब हवाएं सनसनाती हैं , रेत  आसमान छेक लेते हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. धूप जब आग बनता हैं , चेहरा गोरा से काला पड़ता हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. जब बजती हैं घंटी , शांति भंग हो जाती हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. पेड़ के नाम पर बबूल दीखते हैं , और जमीन की जगह रेत , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. जब प्यास लगती हैं , और पानी नहीं मिलता , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. आंसू आँखों में ही सूख जाते हैं , दर्द कुह्कते रहते हैं , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. रात को जब नींद खुलती, बत्ती जलते हुए मिलती है , तब आभास होता हैं , अकेला हूँ , इन पहाड़ो के बीच. Copyright@Sankalp Mishra
आम आदमी और राजनीति .......................................... असंख्य लोग तैयार हैं समर्थन के लिए , धन और वोट देने के लिए , तेरीआवाज पर झंडा उठाने के लिए , लोग परिवर्तन के लिए तैयार हैं , लेकिन तुम नहीं आओगे , तुम नेता नहीं बनोगे , तुम्हारा अपना परिवार हैं , तुम्हे जो जून की रोटी कमानी हैं , तुम्हारी मज़बूरी हैं नौकरी करना , तुम नहीं आओगे ? फिर कौन आएगा ? और अगर तुम नहीं आओगे , तो क्या तुम्हे अधिकार हैं ? प्रश्न करने का ? भ्रष्ट नेताओं पर, भ्रष्ट अधिकारी और न्यायपालिका पर , शोषण और अत्याचार पर , दो कौड़ी के सरकार पर , नहीं |तुम्हे अधिकार नहीं । तुम अगर गन्दगी साफ़ नहीं करते , तो बंद कमरे में भाषण मत करो , तुम्हे अगर नेता नहीं बनना , तो फिर सहो चुपचाप , जो भी हो रहा हैं सहो । चुपचाप । तुम आम आदमी इसी लायक हो । तुम्हे भगत सिंह चाहिए लेकिन वो पडोसी होना चाहिए , तो सुनो आम आदमी , तुम इसी लायक हो , जो भी तुम्हारे साथ हो रहा हैं , बिलकुल सही हो रहा हैं , तुम इसी के लायक हो । Copyright@Sankalp Mishra
चार पैसे ज्यादा मिला जो तुरंत निकल गया , उसकी जय - जयकार होते देखिए , जो अपने वादे को निभाने को कटिबद्ध हैं , उसको रोज अपमानित होते देखिए । अजीब दुनियां हैं इसके तरीके भी निराले हैं , जो सच के लिए लड़ता रहा अकेला रह गया , और जो झूठ पर झूठ बोलता रहा हर कदम , उसको अब  बुलंदी का गीत गाते हुए देखिए । जो उसके कंधे पर पैर रख कर ऊपर चढ गया , उसी को उसका झंडा लहराते हुए देखिए , जो नमक आदयगी का रट लगाए लड़ता रहा , उसी पर सारे " लांछन " लगते हुए देखिए । किताबों में पढ़ाया गया सच की  जीत होती है , सच के धरातल पर इसे जुमला बनते देखिए , जो आगे जाने के लिए कुछ भी कर सकता है , उसको बुलंदी का खिताब लेते हुए देखिए । Copyright@Sankalp Mishra
असल जिंदगी में , जो इंसान सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है , वहीं सबसे ज्यादा बदनाम होता है , इस्तेमाल होते वक्त वो जान नहीं पाता , इस्तेमाल होने के बाद बता नहीं पाता , शतरंज के खिलाड़ी जीतकर खामोश रहते हैं , प्रवक्ता बने प्यादे शहीद होते हैं , लेकिन हर कहानी के अंत में मालूम चल ही जाता है , कृष्ण कौन , अर्जुन कौन ,दुर्योधन , शकुनि कौन हैं और कौन कर्ण और कौन एकलव्य हुए हैं , लेकिन सच ये है कि नाटक ख़तम होने पर ही , सभी पात्रों का चरित्र सामने आता है , किसने क्या किया ये पता चल पाता हैं । Copyright@Sankalp Mishra
1. हम इश्क़ करे हैं , वो क़त्ल करे हैं , हम दिल देवे हैं , वो जान लेवे हैं , कोर्ट , कचहरी , अख़बार सब के करे , हम अपने खून का इल्ज़ाम खुद ही लेवे हैं ।। 2. नया हिंदुस्तान है , नए हुक्मरान हैं , ये जो कहेंगे वहीं सच हैं ,वहीं ईमान हैं , सच क्या हैं , झूठ क्या हैं क्या फर्क पड़ता है , ज़ालिम भी ये , जज भी ये , जुल्म भी इन्हीं का , हम ही तो पिटे हैं और हम ही कटघरे में हैं , कोर्ट , कचहरी , अखबार कौन करे , हम अपने खून का इल्ज़ाम खुद लेते हैं ।