दीपक

दीपक जलता ,
दुनिया बड़ता,
मुख पर हंसी ,
अंदर अंतर जलता ,
रंगमंच की दुनिया में ,
अभिनय का मिशल बनता है
दीपक जलता ,
अँधेरा बढता ,
सत्य भ्रान्ति बन ,
अपनी कहानी कहता,
छल,कपट,राजनीति में
सत्य वैशाखी पर चलता .
दीपक जलता
पथ भटकता ,
जीवन में मिलती नहीं धुरी ,
मानव खेलता एक ही खेल ,
मुंह में राम बगल में छुरी ,
आहिये राम त काटब मुड़ी .
दीपक जलता
राहे भटकती
नाव पर गाडी या गाडी पर नाव ,
पता नहीं चलता .

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