मै एक झोपडी बना रहा हूँ.

अँधेरा है ,सन्नाटा है
और
किरण दिखाई देती है
बहुत दूर से आती हुई.
एक सागर है गहरा ,इतना गहरा
कि हम थाह नहीं ले सकते
वह फैला है दूर-दूर तक
जहाँ तक हमारी ऑंखें जाती है
और जहाँ तक हम सोच पाते है
उससे भी दूर .
वह मौन है ,वह शांत है
वह रहस्मय है ,
और
इतना पवित्र जैसे अग्नि,दुग्ध और गंगा .
एक नदी है बहुत करीब मेरे
बहुत चंचल ,बहुत चतुर
और
बहुत हद तक नादान
उसमे सूक्ष्मता है,उसमे दीर्घता है
एक संगीत है उसमें
और
एक सौन्दर्य ,शांति,मोह .
मैंने सागर में तैरने का प्रयास किया
डूब गया
नदी ने मुझे नहीं अपनाया
अब
मुझे एक जंगल दीखता है
जिसमें हमेशा बारह रात बजते है
जिसमे घोर सन्नाटा है
एक नदी बहती है उसमे
झरना भी गिरता है उसमें
हिरन से लेकर शेर तक,
कौवा से लेकर मोर तक
सब मिल जाते है उसमे .
मैं एक झोपडी बना रहा हूँ
झरने के किनारे
जिसके बगल में एक बरगद का पेड़ है
जिससे सौकड़ो रस्सियाँ निकली हुई हैं
जो मुझको संबल देती हैं
मेरे पास दिया नहीं है
टटोलना पड़ता है सबकुछ
फिर भी
भूखे नहीं मरूँगा मैं
क्योंकि
मैंने देखा है उनको
जो बिना खाए अघाए रहते है
उनके सहारे मैं रहूँगा
मैं जनता हूँ
सुरक्षा कि गारंटी यहाँ भी नहीं है
क्योंकि
यहाँ भी शेर रहते है
और
साथ-साथ सियार घूमते है
फिर भी
मै एक झोपडी बना रहा हूँ.

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