क्यों लोग इतने तंग
मेरा पता कहाँ है ?
न हास,न परिहास
बस मैं अमलतास
स्वप्न में कोई काश
जंगले होता मेरे पास
मैं देखता तारा
होता कोई ऐसा आकाश .
न कोई रंग ,न उमंग
बस बेहोशी वाला ,बेस्वाद भंग
होता कोई मेरे संग
पहचान लेता मैं भी रंग
क्यों लोग इतने तंग
कौन करता सबको दांग ?
जीवन क्यों इतनी बदरंग ?
क्यों लोग हारे,बेदुम ,बेसंग .
सबको ज्ञात है अंत
आता क्यों बार-बार बसंत
कौन देता दिलाशा हमे अनंत
भ्रमित मैं आज
बताएं कोई मेरे पथ का कहाँ है अंत.
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