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Showing posts from September, 2011

रक्षाबंधन

हाथ में थाली,मिठाई ,अक्षत और रोड़ी लिए खोज रही होगी मेरा बाट जाता मै काश दिखाती मुझे कोई नई राह उत्पन करती जीने की चाह , देती मुझे अनंत उपदेश पर मैं अभागा बैठा यहाँ परदेश खोजता नदी तीरे उर्मियो को उन बन्धनों को जिससे बंधा था उसने दिया था मुझे अथाह प्रेम गहन रहस्य अग्नि की पवित्रता माँ का वस्तल्या चाँद की शीतलता और माँगा था बस एक वचन रक्षा का . कहा था रक्षाबंधन तो बहाना है यह प्रतीक है पवित्रता का प्रेम का यह एक तरीका है जिससे जीवन सुंदर बनता है . वह खड़ी होगी दरवाजे पर होगा उसको विस्वास मैं आऊंगा देख रही होगी सपने तैयार होगी सुनाने के लिए एक कहानी एक कबूतर था एक साथी था उसका सहसा एक दिन उसका साथी नहीं आया खेलने करके अठखेलिया दिखने प्रेम मुह चिड़ाने फिर भोलेपन से पूछेगी क्यों नहीं आया उसका साथी ? और मैं मौन रहूँगा क्योंकि ज्ञात है मुझे ये भी चली जाएगी ससुराल हम सबको छोड़ कर .

दलित की आत्मकथा

तब ......... हार सहे , तिरस्कार सहे, मार सहे ,गाली की बौछार सहे , बुझते जलते अरमान सहे , चुप रहे ,हर दंड सहे . पहले बीबी को भेजा , बेटी को भेजा , फिर बहु को , पहले बाप और अब मैं , तन और मन और मान सब बेचा , सम्पति और शासन, आबरू और ओज , आत्मा और आंसू , सच और झूठ , दिन -दिनभर काम किये , रात -रातभर सेवा , बीमारी की खरीदारी की , और मौत का सौदा , शून्य हुए हस्ती से , गिरहस्थी से, बस्ती से . लेकिन अब .......... शासन है , सामर्थ्य है , सत्य है , सुविधा है , सम्मान है , और संस्कार भी है ? आज डंडा हमारे हाथ है , पीठ है उनकी , नौकरी हमारे हाथ है शिक्षा है उनकी , दमन हमारे हाथ है दासता है उनकी , दंभ हमारे हाथ में है पराजय है उनकी , तलवार हमारे हाथ में है , संधि है उनकी , फैक्ट्री हमारे हाथ है कारीगर है उनके , सम्पति हमारे हाथ है मेहनत है उनकी, मौज हमारे हाथ में है मानसिक त्रासदी उनकी , रखैल हमारे घरो में है बेटियां है उनकी , सत्य हमारे हाथ में है , और शब्द उनके .

औरत

गुड़िया  ? माँ ? बहन ? बेटी ? पत्नी ? प्रेमिका ? मर गयी . पुलिस के हाथे चड़ी  या आत्महत्या करी ? कोई तो कहता है बिहार के साधुओ के हवाले हो गयी . कोई कहता है अपहरण हो गया , कोई आयोग नहीं बैठा . स्कूल गयी थी घर नहीं आई सहेलिओं ने कुछ नही देखा ,कुछ भी नहीं कहाँ गयी ? किसी कोठे पर ? या किसी नेता के कोठी पर ? मेरी  गुड़िया   कितनी अच्छी कविता करती थी , वीर - रस की वह तो श्रृंगार -रस जानती भी नहीं थी , लोग कहते है मुझसे जब उसकी लाश मिली उसके पेट में बच्चा था चार महीने का . गुड़िया  कितनी सुंदर थी वह बाज़ार गयी थी सब्जी लेने , नहीं आई लौट कर , आयोग बैठा अखबारे बिकती है उसकी खबर पर . मैं नहीं रोता हूँ , क्योंकि लोग कहते है यह नियति है , यह जीवन है , यह संसार है , यह सत्य है मैं क्यों नहीं समझता मुर्ख हत्या ,बलात्कार ,घोटाला ,अपमान हर अपराध एक नियति है . गुड़िया    किसी कि नहीं ,उसका कोई नहीं वह तो बनती है समाज के लिए उसके गुलामी के लिए उसके हवास पूर्ति के लिए . मैं क्यों नहीं...

कोई सुने न सुने तो मई क्या करूँ.

जिंदगी बनी है ,बंदगी के लिए कोई गन्दगी में दुबे दे तो मैं क्या करूँ हर डगर है ,सफ़र है सौहर के लिए सौहर ही न माने तो मैं क्या करूँ . मैं तवायफ हूँ लिखा है हर मोड़ पर , कोई दुल्हन बना ले तो मैं क्या करूँ बदन तो मिला है सृजन के लिए कोई जबरन मजा ले ले तो मैं क्या करूँ . जीवन तो बना है बस भजन के लिए कोई व्यसन में बिता दे तो मैं क्या करूँ . हर क्षण है ,यौवन है ,जतन के लिए कोई मदन में मिटा दे तो मैं क्या करूँ . यौवन है ,मदन है ,अनल ही सही कोई नंगा नाच बना दे तो मई क्या करूँ . तन तो बना है बस तपन के लिए , कोई गुटका- मंदिरा में खपा दे तो मैं क्या करूँ , हर साँस है भजन- कीर्तन के लिए कोई श्वसन ही सडा ले तो मैं क्या करूँ . मन तो बना है बस मनन के लिए , कोई गगन में उड़ा दे तो मैं क्या करूँ . नयन तो मिला है दुर्शन के लिए कोई चुडौल चुरा ले तो मैं करा करूँ. आजादी मिली थी अमन के लिए, सुखद सपना के पूरन के लिए, नव भारत मिला है सबन के लिए , कोई आरक्षण अपना ले तो मैं क्या करूँ . अब कांटे मिले है चुभन के लिए , नव नेता मिले है लुटन के लिए, बलात्कारी मिले है कीर्तन के लिए, अपनों के लिए ,परिजन के गहन से गहन ग...

चेहरे के पीछे का चेहरा

मैंने देखा था एक सागर , उसकी गंभीरता , धौर्य, साहस और उसकी पवित्रता अथाह प्रेम , अथाह गहराई निरपेक्ष ,सीमाहीन और उसका निष्कपट चेहरा परन्तु देखा मैंने आज एक सागर उसके अंदर झांककर खोखला पराजित,कुंठित उसका असीमित घृणा संसारिक मोह ,तृष्णा और उसका छोटापन वैर भावना और जलता ह्रदय . एक बार मई चांदनी रात में , रातभर चाँद को देखता रहा था , अनंत शीतलता माँ से ज्यादा वास्तल्या, गुडिया से ज्यादा करुणा एक आनंदमयी स्नेह डरो विश्वास और ममता का अंचल . परन्तु देखा मैंने आज चाँद उसके ह्रदय में समाकर उसके ह्रदय के ज्वाला को असहनीय पीड़ा अनंत अवसाद परत उसकी बेचैनी सपनो में बदबदाना मंदिरा में डूबा चेहरा सौन्दर्य से घृणा प्रेम से इर्ष्या खुद से लड़ने को आमादा उसका मलिन,तेजविहीन देह और उसका बनावटी चेहरा जिसको वर्षो से देखता आ रहा था . ऐसा ही एक चेहरा होगा सूर्य का भी जिसको दुनिया नहीं देख पाती. शायद इतनी ही ज्वाला अंचल में छुपा कर सह लेती है मेरा भार आह! भी नहीं निकलने देती . कितनी सायानी है मेरी माँ सारे परिवार का बोझ लेकर माथे पर एक सीकन नहीं आने देती शायद मैं कभी नहीं देख पाउँगा चेहरे के पीछे का चेह...

बोलो क्यों टूट जाते हो ?

डूब जाते हो ,गर्दन भर पानी में , हौसला हार कर रुक जाते हो , जहाँ आवाज बुलंद होनी है , मूक हो जाते हो , बोलो क्यों टूट जाते हो ? बीच युद्ध में क्यों डर जाते हो, तलवार तुम्हारी तेज़ है, फिर निशाना क्यों चूक जाते हो, रुक जाते हो मझधार में , पूछता है सारा जहाँ आज , बोलो क्यों टूट जाते हो ? रुक जाते हो लम्बी दूरी देख कर, झुक जाते हो भार से, मिला है जीवन लड़ने को , थक जाते हो दिमाग से, पूछता है सारा जहाँ आज , बोलो क्यों टूट जाते हो ? मंजिल निकल जाती है सामने से, और तुम छुट जाते हो . होर्न सुनाई नहीं देती , पूछता है सारा जहाँ आज , बोलो क्यों टूट जाते हो ?

कब कहा था मैंने तुमको,

कब कहा था मैंने तुमको , आपने घर ले आने को , कब कहा था मैंने तुमको इतना प्यार लुटाने को , कब कहा था मैंने तुमको , वीर मुझे बनाने को , कब कहा था मैंने तुमको युद्ध लड़वाने को. कब कहा था मैंने तुमको , मानव मुझे बनाने को , कब कहा था मैंने तुमको, छल- कपट करवाने . कब कहा था मैंने तुमको, अपनी दया मुझे दिखाने को , कब कहा था मैंने तुमको, मुझे जेल भिजवाने को. कब कहा था मैंने तुमको करोडो लूटवाने को , कब कहा था मैंने तुमको फिर आपने जाल में फंस जाने को. कब कहा था मैंने तुमको , दिल की नगरी बसाने को , कब कहा था मैंने तुमको, खुद को भुलाने को.

पर तुम कमजोर नहीं

बैक है ,बदनाम है बलवान ही सही , कदम-कदम पर लोगो की ओछी निगाह भी सही , पर तुम कमजोर नहीं, लाचार, हताश नहीं . बैक है ,बुरा है , असमान दूर है ,सही हर बार ,हर कदम पर , मिल रही हार दर हार ,सही पर तेरे हौसले पस्त नहीं , तेरे बांहों का प्रचंड बल कम नहीं . बैक है ,बदकिस्मती है , भगवान् का गुस्सा भी ,सही आगे गहन अँधेरा , अँधेरे का सफ़र भी,सही पर तेरी रौशनी कम नहीं तेरे कर्म की कथनी कम नहीं . बैक है,बलजोर है , तानाशाह भी ,सही आकाओ का फरमान भी,सही दोस्तों के आँखों में , समाज के बातो में, निठल्ला ,कमजोर , होने का अहसास भी,सही पर तेरे आँखों का उत्साह कम नहीं, तेरे पैरो का पड़ाव कम नहीं.

स्वाभिमान की बिक्री आज का सम्मान है

खुशबू -ऐ-जहान की, बुलंद कर दी आपने , रुखी जिन्दगी में , रंग भर दी आपने . डूबते सतह की , टूटती धडकनें , बुलबुले की जिंदगी पर , आज ये अडचने , शाम की बदली , सुबह की ओस , डूबते मुसाफिर की हाथ थम ली आपने . मुखौटो की जिन्दगी , रंग है ,रूप है , झूठ का बाज़ार ,सच का दरबार , स्वाभिमान की बिक्री आज का सम्मान है , रोज के अपमान में रोटी-कपडा -मकान है , चेहरे पर चेहरा आज दिखा दी आपने . चिलचिलाती धुप में ,बर्फ की चट्टानें , उधार है जिन्दगी ,भीफ मांगी सांसे , मौत के के फरमान का गुमान कौन माने , उंगली पकड़ के चलना सिखा दी आपने.

जीना-मरना सब पैसे के लिए

एक दिन निकला पटना से घर के लिए , बिलखते लोग मिले, मिले भिखारी , कांपते हाथो में पैसे लिए . सफ़र में हर बाप पर, हर भाई पर, हर दोस्त पर , अजब विवशता थी पैसे के लिए. मैंने देखा डॉक्टर को मरीज से खेलते , नेता को डॉक्टर से खेलते , सड़क पर सडक खोजते लोगो को , शायद वो भी भटक रहे थे पैसे के लिए . मैंने देखा कर्मभोगियो को धर्म कि बातें करते , धर्मभोगियो को , विलास-व्यवसाय में कूदने को तत्पर , शायद वो भी जी रहे है पैसे के लिए . कहा एक मित्र में - पैसा बोलता है धर्म-अधर्म , कर्म-कुकर्म , योग-विलास , जीवन का हर उल्लास भी पैसे के लिए. मुझे तो लगता है बच गया है जगत में एक उद्देश्य जीना-मरना सब पैसे के लिए .

चाहता तो हूँ

चाहता तो हूँ यह क्या है जो, मुझे रोक देता है ,तुन्हें भी, चाहता तो हूँ पर जाने कहाँ जा कार रुक जाता हूँ, और लौट आता हूँ वहां जहाँ से चला था. चाहता तो हूँ परन्तु रस्ते गूम हो जाते है बार- बार और मै भटक जाता हूँ वो राह जहाँ , हम मिले थे वहां , जहाँ से रस्ते अलग होते थे , और जहाँ से वादे हो सकते थे , फिर से मिलने के . चाहता तो हूँ परन्तु दूरियां इतनी बड़ गयी है कि लौटना मुस्किल हो रहा है .

सुनामी

एक हवेली पुरानी, हल्के -हल्के हवा के सहारे , आते दुःख में सने गीत, शांत लहरों कि तरह. सामने एक नीला तालाब , और वहां हंसो का हुजूम, एक वृद्ध आदमी , झूले हुए गाल , और आँखों में गहन उदासी आंसू , बिना टपके बादला कि तरह . यह बारह रात दिसंबर की, गहन अंधकार में हिलते हुए असहाय हाथ, जैसे बचा न हो कुछ ह्रदय में , और जैसे याद आ रही हो कल की रात. ये सर्द मंद-मंद पवन , होती नहीं सहन , दिला देती है याद , अंदर अंतर में पड़े दाग , खुनी तरंगो का बेख़ौफ़ हास्य , और गुलाबी चेहरे की छोटी -छोटो आंख. इन बचे गुलाबो का विहंस , तार-तार होती इनकी आशा , ये दिसंबर की अंतिम रात, और सुबह का उदासीन इन्तजार .

मै एक लड़की कि तस्वीर बनता हूँ.

मै वर्षो तक , अकेला बुझा -बुझा सा रहता था , न कोई मेल-मिलाप , न क्रियाशीलता , ठीक वैसे ही , जैसे भीड़ -भरी सडक पर , निडर ,थेथर -सा पड़ा एक पत्थर . मै वर्षो तक, रोता रहता था , बिना आंसू के , बेआवाज , और सिमटते जाता था शून्य में , वैसे जैसे घोघा पानी कि बूंदों को समेटे , अपने में सिमटा रहता है , और लड़ते रहता है अपने आप से. वर्षो तक गुडिया उंगली पकड़ कर चलना सिखलाती रही , लेकिन उसके जाने के बाद अपंग हो गया हूँ. मै वर्षो तक आड़ी-तिरछी लकीरे खिचता था , कविता के नाम पर शब्दों कि डेर लगा देता था , तुने मुझे काव्य सौन्दर्य सिखलाया , अब मै एक लड़की कि तस्वीर बनता हूँ.

प्रत्येक प्रतिबिम्ब में एक छाया दीखता है , तुम्हारे छललाई आँखों के पानी में , मुझे सागर का काया दीखता है, नदी में डूब चूका हूँ , अब तेरे अलसाई आँखों की , गहराई में गोता लगाना चाहता हूँ, मै तुम्हारी आँखों में पल-पल घुल कर ,

प्रत्येक प्रतिबिम्ब में एक छाया दीखता है , तुम्हारे छललाई आँखों के पानी में , मुझे सागर का काया दीखता है, नदी में डूब चूका हूँ , अब तेरे अलसाई आँखों की , गहराई में गोता लगाना चाहता हूँ, मै तुम्हारी आँखों में पल-पल घुल कर , अपना वजूद खोना चाहता हूँ, हां मै तुम्हे प्यार करना चाहता हूँ. मै बहुत बार गया वहां , जहाँ अंतिम बार मिला था तुमसे , घंटो इंतज़ार किया , कि शायद ,शायद तुम आ जाओ , लेकिन तुम फिर कभी नहीं आई , और हर बार मै मायूस लौट आया . तुमसे एक बार मिलना चाहता हूँ , ताकि मै बतला सकूँ ,हां मै सच हूँ , ताकि उस प्रत्येक क्षण कि याद दिला सकूं , जिसे तुने मुझे दिया था, हां मै तुम्हे प्यार करना चाहता हूँ. सपने में तुम्हारी आवाज सुनता हूँ, गंगा नदी के एकांत किनारे , तुम्हरे गले में बांहे डाले, तुम्हारे गोद में खोया, मै तेरे बालो से खेलना चाहता हूँ, हां मै तुम्हे प्यार करना चाहता हूँ.

हां मै तुम्हे प्यार करना चाहता हूँ

तुम लौट आओ , मैं तुमसे बहुत कुछ कहना चाहता हूँ, मै उन क्षणों को लौटना चाहता हूँ, जिसे मैंने पाया था सबकुछ खोकर, हां मै तुम्हे प्यार करना चाहता हूँ.. मैंने काँटों की तो बहुत बागवानी की है , आंसुओ का तालाब भी खोदा है , दर्द का सागर तो मेरे उर में है , पग-पत्थर तो मेरे जीवनसाथी है, मैंने मुरझाये हुए बादाम बहुत लगाये है , लेकिन आज तुम्हे एक गुलाब देना चाहता हूँ, हां मै तुम्हे प्यार करना चाहता हूँ.. मै जनता हूँ तेरे ऊपर क्या बिता है , क्या- क्या झेला है जमाने में तुमने , मेरे कारण रहना पड़ा है तुम्हे चारदीवारी में , तोतो और तालाबो से बाँटना पड़ा है दर्द, मै जनता हूँ तेरे उर में आग पलता है अब , तुमरे होठो से मुहब्बत के बाण नहीं, बगावत के प्रचंड तान निकलते है, लेकिन फिर भी मै तुम्हे प्यार का राग सुनना चाहता हूँ, हां मै तुम्हे प्यार करना चाहता हूँ.. मुझे आज भी याद है वो क्षण , जब तुमने मेरे घुटने पर पट्टी लगाया था, और सर्द-सुबह में मेरे कापते होठो को सहारा दिया था , मै भूल नहीं पाता तेरे जन्मदिन का खीर , तेरे बांहों के सहारे सीखी लिखावट , मै उन सभी बीते क्षणों के सहारे लौटना चाहता हूँ, हां ...

गेहूंअन सांप शहर में नहीं मिलते

गेहूंअन सांप शहर में नहीं मिलते , बेचारो की इज्जत नहीं होती यहाँ , गली -गली में वजूद की लड़ाई लड़नी पड़ती है , क्योंकि यहाँ गली-गली में गेहूंअन से भी विषधर सांप रहते है . गेहूंअन सांप गाँव में रहते हैं , सीधे सपाट लोगो के बीच, उसका मूल्य,धौस रहता है गांवो, धमकाते रहता है घूम-घूम कर और रंज होने पर काट लेता है. गेहूंअन सांप शहर में नहीं रहते , क्योंकि कंक्रीट ,कागज और कारो के मध्य कोई फाक नहीं बचता , उन्हें कोई घर नहीं मिलता , जहाँ रह कर वह अपनी पहचान बना सके, क्योंकि शहर में किरायदारो कि कोई पहचान नहीं होती , वे बस जनसँख्या होते है जैसे पशुसंख्या . गेहूंअन सांप गाँव में रहते है , क्योंकि गरीबी,गाली और ज्ञान -हीनता के बीच , बड़ी-बड़ी फाके होती है , जहाँ वे आराम से रह सकते है और भय,भाईवाद और भ्रटाचार फैला सकते है .

मेरे जिंदगी के पन्ने फटे जा रहे है.

मैं अकेला हूँ, मुझे उजाला नहीं चाहिए , मैं काली रोशनी चाहता हूँ, मुझे भीड़ का हो-हल्ला पसंद नहीं, मैं सुबह का सन्नाटा चाहता हूँ. मेरा विश्वास खो गया है , जिसके सहारे मै लड़ता हूँ, अब मै ॐ का लगातार जाप करता हूँ, ताकि सामर्थ्य ,सततता और संस्कार फिर अपने झोली में बटोर सकूँ. मैंने बहुत कुछ खो दिया है , जैसे बल,विश्वास और विवेक , मैं लगातार छीजता जा रहा हूँ , जैसे चूतड के पीछे का पैजामा . मैं बहुत शांत बैठा हूँ, क्योंकि मुझे कही नहीं जाना , मैं आंख बंद कर के बैठा हूँ, क्योंकि मेरे जिंदगी के पन्ने फटे जा रहे है.

मै दीपक हूँ

मै दीपक हूँ ,जलता हूँ धीरे- धीरे, गलता जाता हूँ मोम की तरह , लेकिन मै उजाला नहीं फैलता हूँ, मै अँधेरा बांटता हूँ . मेरा उर में आग का गोला है , जिससे लगातार लपटे निकती है, लेकिन वातावरण में गर्मी नहीं फैलती , एक बर्फीली लहर दौड़ती है. मै हिमालय हूँ पत्थरो का, जिसके शिखर की कोई सीमा नहीं, लेकिन मै अपने वजूद के लिए चिंतित हूँ, क्योंकि मौत कि सुनामी मुझसे लगातार टकराते है . मै नदी हूँ बिन पानी का, जिसमे कोई प्रवाह ,सतता नहीं, मेरे घर में हमेशा धुल उड़ता है , क्योंकि सूरज से लगातार दुमानी चलती है. मैं चिर पुरातन हार हूँ, मेरे बगीचे में मुरझाये हुए बादाम है , क्योंकि मै हमेशा स्वय से लड़ता रहता हूँ, और सामने वाला हमेशा जीत जाता है. मै दीपक हूँ जलता हुआ , क्यों कि हमेशा मेरे घर में अँधेरा रहता है, मै प्रयास कभी छोड़ता , क्योंकि मै जनता हूँ , अँधेरे जरुर हार जायेगा .

अटल है

साज अटल ,संगीत अटल यह मौन क्यों छाया है , सूर्य अटल ,चाँद अटल अँधेरा क्यों घिर आया है . हार अटल,जीत अटल सतत संघर्ष कौन बनाया है , जन्म अटल ,मौत अटल , यह युद्ध मैदान कौन बनाया है. मिलन अटल,विरह अटल , यह उर वेदना कौन बनाया है, प्यार अटल,पश्चाताप अटल , माथे पर काला निशान कौन लगाया है. धरती अटल,गगन अटल कौन रोज मुझे घुमाता है , पग अटल,पहुच अटल कौन मुझे दौड़ता है. राह अटल,राही अटल , यह भीड़ कौन बढाया है, आगाज अटल,अंजाम अटल , यह पेलम-पेल कौन मचाया है. चाह अटल ,चौपाल अटल , यह प्रत्राचार कौन करवाया है , भक्त अटल ,भगवान अटल , यह पूजा कौन बनया है ?

सवाल है

यह गिला- गिला पानी, न स्वाद, न रंग , न संग , संरचना ,आवश्कता और लक्ष्य , सवाल है नाली, गंगा या समुन्द्र , सिमित जीवन,अभिलाषाए अनंत , अपनी प्रकृति, उदासीनता , आदत,आलस और यह समय. यह झुकी- झुकी अनार की लताएँ हरी-भरी,सुंदर,कोमल,समर्थ झुकना ही पहचान ,मदद,नमन, लक्ष्य सुंदर, मीठे ,रसीले फल, सवाल है दब्बूपन ,दासता या हीनता ? यह चौबीसों घंटे जुड़े हाथ , उच्च शिक्षा,उच्चे पद ,सूरजमुखी बने है सर, स्वाभिमान,मर्यादा या चापलूसी धर्म ? यह सुखा -सुखा धुल, हर पल,हर कण गगंमुखी , सड़क की मिटटी ,बल्लो का डेर, सभागारों में अठखेलियाँ , सवाल है योगता,लिंग या आसन ? हर गली दुकान,हर चौराहा मकान, पैदल हाफते,दौड़ते गर्मी में एकलव्य , धन,बल, जन्म पैमाना कौन ? यह कस्तूरी मृगो का मेला , गीधो का हर मोड़ पर डेरा, ...

मै क्या लिखूं ?

मै क्या लिखूं , मैंने तो गुनाहों का देवता पड़ा है , लैला-मजनू के किस्से सुने है, गुडिया के यादो में खोया रहता हूँ, मैंने तो कभी पड़ा नहीं, काबुल के दस साल के बच्चे के आँखों को, जिसमे बारूद छुपा है, जिसकी नजरे जानती है केवल एक भाषा , मै कैसे कहूँ, उन आँखों में आंसू नहीं होते, आह नहीं होते, सपने नहीं होते, अपनी माँ ,एक औरत से प्यार नहीं होता , मै कैसे कल्पना करूँ उस बच्चे की , जिसके सामने उसकी माँ,बहन का ...... जिसके सामने उसके भाई का ,बाप का ........ और उन सारे लोगो जिनको वो पहचानता था, वो हुआ जिसके बारे में वो कुछ नहीं जनता , बस याद है उसको वो चीखे ,दृश्य , जिसका अर्थ दस साल बाद समझ पायेगा , और तब तक सिध्हस्त हो चूका होगा , हर हथियार को चलाने में, मै क्या लिखूं उस किशोर लड़की के बारे में , जो नौ दिन भूखे भागती रही, और जब राहत कैंप पहुंची , पानी के बदले वीर्य पीती रही , अपने देह के थिनो छिद्रों से , और जब रोटी की बारी आई , उसकी सांसे उससे रूठ गयी थी. मेरे शब्द भागने लगते है , उस अस्सी साला बुडे के जिन्दगी से , जिसके छह बेटे और चौदह पोते थे , वो सारे ,वो सारे अमरीका देवता के भेट चढ़ गए...

मौत कि मुस्कान .

कई बार सोचा , कैसी होती है हंसी , कैसी होती है जिन्दगी , कैसी होती है मुस्कान, लेकिन देखा आज बीच बाज़ार , एक बुडिया लिए हाथ में झोली , दे रही थी पुकार बारम्बार , बुडिया को मिले थे सिक्के दो-चार , एकाएक मत गयी भगधड, मच गया हाहाकार , फिर शांति छा गयी कुछ देर बाद, बुडिया अब भी रही थी पुकार , लेकिन अब उसे गोली लगी थी, सिक्के बिखरे थे दो -चार , मैंने सोचा ऐसी होती है मौत कि मुस्कान .

बिहार-बंद

जिंदगी के राह पर , आकर क्यों हम रुक गये, कमर तो अभी सीधी ही है , फिर हम इतना कैसे झुक गए ? इस महान भारत के कर्णधारो का , बिहार को बर्बाद करना अभी बाकी है , गाली, अपमान का पर्यायवाची, बिहार में भारत नहीं . अरे ! अभी तो बहुत कुछ देखना बाकी है , अभी से टूट गए ,इतनी जल्दी झुक गए ? अभी तो एक-एक जगह ,कोने-कोने से, निकाला जाना बाकी है , हर बिहारी को , बीच सड़क पर दुद्कारा जाना बाकी है. तुम भोले हो तो क्या हुआ , प्रतिभा के धनी हो तो क्या हुआ , तुम भूखे हो तो क्या हुआ , तुम पानी पी कर सोते हो तो क्या हुआ , अरे ! अभी तो तुमको एक-एक रोटी के लिए , द्वार-द्वार फटकारा जाना बाकी है , अभी से झुक गए,इतनी जल्दी टूट गए ? कोई अरबो लुटे तब भी तुमको , इक सिक्का नहीं छुपाना है , भूख से अगर मार भी जाओ , आवारा लाश बन जाना है , अरे कोई देश बर्बाद कर दे , तब भी तुमको क्या हुआ , अरे तुम गुलाम ठहरे , तुम्हरा भारत से क्या नाता है , इस देश में हर बिहारी खून देने आता है , बदले में अपमान गरल पी कर सो जाता है . अरे अभी से तुम चिंतित ? अभी तो तेरे देह में कई कतरा बाकी है , अभी से झुक गए,इतनी जल्दी टूट गए ? अटल ने बि...

भारत सरकार

भाई ! आई अटल की राज , खाओ गोरी दाल-भात , मत रोपो गन्ना , उगाओ मत धान , आ रही है अंग्रेजी चीनी , खाओ मिल-बाट. भाई ! आई अटल की राज , करो मोबाइल पर बात, मारो मेरे कृषक पिता के पेट पर लात. भाई तुम फिल-गुड करो , बिताओ पानी पर रात, भाई तुम दर्शक हो , देखो मिडिया-कारगिल खेल, भले हजारो बेटे तेरे गए पील. भाई थोरा कॉफी देना , फिर चलते है बिहार , राजा लालू की सुनते है दास्तान, बम्ब,बारूद ,बंदूख का देखेगे कमाल. भाई थोड़ी देर तुम बैठो , मै अपना कैमरा ले लूँ, फिर चलते है गुजरात , दिखाउगा तुमको वहां, कैसी होती है रोटी-औरत- रात, भाई थोडा तुम पैसा ले लो , फिर हर उम्र की दिला दूंगा सौगात, तुम बस इन्तजार करना , मै लाउगा बहुत सारी फोटो, जलते हुए मकान, लुटते हुए दूकान , खोपड़ी की माला, नारी स्तनों ले लदा डेला, मै और भी फोटो लाऊंगा , बच्चो की ,जो अनाथ हो गए , माँ की जिनके बेटे जवान थे, और उन गुडियाओ की , जिनका रोज चीरहरण होता है, कभी जबरन , कभी रोटी के लिए,कभी दवाई के लिए . बस तुम सब्र रखना , मै दिखाउगा उन बुददो को, जिनका भरा था परिवार , मै उन लोगो को भी दिखालाउगा , जिनको देख कर तुम रो दोगे लेकिन मै तुमक...

लिखते क्यों नहीं

लिखते क्यों नहीं , परदा क्यों दाल देते हो आगे ? स्वच्छ हवाओ को क्यों नहीं आने देते , खिड़की क्यों बंद कर देते हो ? चार ही तो दिन होते है, क्या तुम ये भी नहीं जानते ? डर जाते हो. क्यों ? कुछ नहीं होता वहां , सिर्फ भौजाल होता है, कुकुरमुते उपजते है, कुत्तो का भोकना काम होता है , तुम रुक क्यों जाते हो ? तुम तो समुन्द्र लाँघ सकते हो , ये तो फिर भी तालाब है, दौड़ते जाओ , देखो ! आगे ही तो गाँधी का आश्रम है , उनका बलिदान है , उनका बेख़ौफ़ आवाज भी सुनाई देगा, सुनना करीब जा कर, कई आवाजे तुम्हे बुला रही होंगी , कई बांहे तुम्हरे स्वागत में कड़ी होंगी, एक बाण भी तो तुमने छोड़ा था , तुम बोलते क्यों नहीं , अपना मुह क्यों नहीं खोलते ? तुम तो तूफान हो, हवाएं हंसती है ठहाका मार कर, मायूस नहीं होती, बिजली गिरा देती है , आतंक धाह देती है , क्या रूम राम को भूल गए हो ? तुम हनुमान को याद करो , तुम भूल रहे हो अपना बल, अपनी गति,लय और तेजी,वेग ,दिशा जिसके सामने पछाड़ खाती है राहे, मिटटी जाती है दुरी, वो तुम्हारी लुवाठ कहा है ? जिसको तुम थामे रहते हो , अरे उसको उठाओ ,देखो वहां तुम्हे पूरा हुजूम बुला रहा है...

मुझे पसन्द नहीं

ऐ जिन्दगी ! तुम जाओ अब नहीं जरुरत तुम्हारी, अब हम नयी जिंदगी बनायेगे, जिसमे मै मालिक होउगा, और नौकर भी मै. मै मुर्ख था क्योंकि मै तुमसे प्रेम करने लागा था , जब कि तुम एक धूर्त संगनी थी, जो मेरे भावनाओ, मेरे धर्म , मेरे कर्मो से खिलवाड़ करती रही, जो मेरे विश्वास,आदर्श और मेरे लक्ष्य को भटकाती रही. जो मेरे संग रह कर , मेरा अन्न खाकर, मेरे घर में रह कर, मेरे तन का हिस्सा बनकर, मुझे ही धोखा देती रही. जो मेरे लाख प्रयास के बावजूद , मुझे निरास,हतास और भयातुर करती रही. जो मेरे इमानदारी, मानवता को हथियार बना कर , मेरे ऊपर प्रहार करती रही. जो मेरे तन,मन,धन, को बर्बाद करती रही, और उलटे अपने को मसीहा कहती रही. जो मुझको कुंठित करती रही, अपने को संघर्ष का नाम देकर, मुझको व्यथित करती रही. ऐ जिंदगी ! तुम जाओ नहीं जरुरत तुम्हारी, क्योंकि तुम्हारे कुंडली और हस्तरेखाए , पाखंडी नियम, पल-पल बदलना , उजालो से भागकर , अंधेरो में घूमना . मुझे पसंद नहीं, क्योंकि तुम्हारी रहस्मय छवि , घोर अनिश्चिंतता , कठोर ह्रदय ,कोमल तन, पल-पल गिरना घयल हो कर , फिर थेथर बनना , मुझे पसंद नहीं, क्योंकि यमराज से तुम्हारी मित्र...

जीवन है पहेली ,युद्ध का मैदान भी

जीवन है पहेली ,युद्ध का मैदान भी, विजेता होगा वही जो भावनाशुन्य शैतान भी. राम-कृष्ण गाँधी अशोक सबका एक नारा , जीवन युद्ध है और विजय लक्ष्य भी. पर वह मानुष क्या करे जिसका अस्त्र ही भावुकता है , जिसका जाति,धर्म,गोत्र ही मानवता है ? वह मानुष भी क्या करे , जो रक्त न बहा सकता है, स्व पर हो रहे अत्याचार को, मौन सह भी नहीं सकता है ? एकलव्य का क्या होगा , क्या दिया समाज ने , प्रेम,श्रधा और गुरुभक्ति का, क्या मिला परुस्कार में? कब तक चलेगा जग ऐसे , कब तक रहेगी दोहरी नीति, कब तक मरेगा कर्ण छल से, कब तक चलेगी ऐसी सृष्टी ?

जीवन

बढता जीवन घटती सांसे, राह भटकता जाता है, जिसको सोचू यही सही है, वही गलत हो जाता है. जीवन पथ पर राही मिलते , पथ बढता जाता है, जिस पर करता विश्वास अपना, वही धोखा दे जाता है. छल -रहित एक दिवस न बीतता , सभी मित्र कहलाते है, जिसको सोचू प्यार देगा , वही गम दे जाता है . रोज़ छाला जाता फिर भी, मई उसी राह पर चलता हूँ, मिलता रोज़ दिलासा मुझको, मै कुछ नहीं कर पाता हूँ. चलना है जीवन इसलिए चलता हूँ, आशा और विश्वास का बोझ लिए, सत्य और सपनो का , मिलाजुला फीका सोच लिए.

सच कल लिखा नहीं गया,आज दफनाया जा रहा है.

सच कल लिखा नहीं गया , आज दफनाया जा रहा है, कल क्या होगा , बोलो कल क्या होगा ? जब आपके बच्चे , आपसे सवाल पूछेगे, और आपके पास सच का अधर नहीं होगा ? बोलो क्या उत्तर दोगे ? विरोध का विकल्प मैजूद था, हथियार का विकल्प मौजूद था, आने वाली नस्लों क़ी खातिर , कत्लेआम का विकल्प मौजूद था, फिर भी , फिर भी आपने विदेशी सत्ता दिया, और दलालों को दरवाजा , हत्यारों को आजादी दी, और संतो को फांसी, बोलो क्या उत्तर दोगे ? कल सच लिखा नहीं गया , आज दफनाया जा रहा है.

जिन्दा हूँ मै

सपने देखता हूँ, इसलिए जिन्दा हूँ मै, आगे इक लम्बी सुरंग है  सुनसान और अकेला, अन्धकार है केवल अन्धकार , आशा का दीप जलाये हुए हूँ, इसलिए जिन्दा हूँ मै. आगे पत्थर है, रोड़े है सडको पर , हर कदम पर ढोकर लगता है, उत्साह कि दौड़ लगाए हुए हूँ, इसलिए जिन्दा हूँ मै. नदी है मेरे चारो ओर, समुन्द्र घेर कर बैठा है , लहरे मुझे डराती रहती है, पतवार थाम कर बैठा हूँ, इसलिए जिन्दा हूँ मै. भीड़ में अकेला हूँ, कोई साथ नहीं है मेरे, खुद ही खुद से लड़ता हूँ, अपने आप को थाम कर बैठा हूँ, इसलिए जिन्दा हूँ मै. हर युद्ध हारा हूँ, हर मैदान में मुकी खायी है, जीत चिढाती है मुझे , हाथ में तलवार लिए बैठा हूँ, इसलिए जिन्दा हूँ मै. सड़के खून कि प्यासी है, नदिया जान क़ी, नेता हमारे पैसे के पीछे पड़े है, खुद को छुपाये हुए हूँ, इसलिए जिन्दा हूँ मै.

अँधेरा अभी बाकी है.

रात बीत चुकी , अँधेरा अभी बाकी है. गीध अघा चुके, कौवों की खेप अभी बाकी है. कौन लिखे इतिहास इसका, कि रात बीत चुकी अँधेरा अभी बाकी है. कभी हरियाली थी, ओस कि बुँदे थी, आपसी हंसी ठहाका था, बच्चे खिलखिलाते थे, और औरते गाती थी, अब जीवित लाशें है घरो में , भूत घूमते है कारो में, मांस के लोथरे थिरकते है है पुबो में, हवा है लेकिन उसमे जीवन नहीं है क्यों कि रात बीत गयी अँधेरा अभी बाकी है.

मौत की आहत खिड़की पर

मौत की आहत खिड़की पर , कुण्डी क्यों लगाते हो ? सारा शहर जल रहा , अब धुएं से क्यों घबराते हो ? बाज़ार उसड चूका ,नीलामी हो चुकी , अब तुम क्यों बोली लगाते हो ?

क्या है सत्य ?

सत्य क्या है ? जो भ्रम नहीं है, या जो झूठ नहीं है , क्या है सत्य ? जिसे सब लोग बोलते है वो सत्य है , या जिसे जोर से बोलते है वो सत्य है क्या है सत्य ? जो सीमाओं में नहीं बंधा ? या जो सीमाओं से परे है ? जो झुक नहीं सकता वो सत्य है , या जो टूट जाता है वो सत्य है , आखिर क्या है सत्य ? सत्य उजाला है , या सत्य अँधेरा है ? आकाश नीला है यह सत्य है , या कुआ काला है यह सत्य है ? क्या है सत्य ? जीवन सत्य है ? या मृत्यु सत्य है ? क्या है सत्य ?

मेरी हर साँस बुलाती है तुम्हे.

यह भीड़ है लोगो की, मेरी हर बात बुलाती है तुम्हे. यह हवा है गर्म है, मेरी हर साँस बुलाती है तुम्हे. यह नदी है बहती हुई , समंदर की चाह बुलाती है तुम्हे. राही हूँ अकेला हूँ, हर राह की भटकाव बुलाती है तुम्हे. यह रात है बीतती नहीं, हर करवट की थकान बुलाती है तुम्हे. यह चाँद है अकेला है, हर रात चांदनी बुलाती है तुम्हे. यह दिल धडकता है, धड़कन की आवाज बुलाती है तुम्हे. सुनी सुनी है आंखे , आँखों के जज्बात बुलाते है तुम्हे. तब वो दिन थे प्यार था, उन दिनों की याद बुलाती है तुम्हे. बादल है घना है , धरती की प्यास बुलाती है तुम्हे. यह ओस है गीली , सुखी होठो की अरमान बुलाती है तुम्हे. सावन है सुहाना है , मोरो की नाच बुलाती है तुम्हे. मै हूँ और मै हूँ, मै तुम होने के लिए बुलाता हु तुम्हे.

देख मेरे भाई लाचारो का देश

देखो मेरे भाई नपुन्सको का देश ! बिजली नहीं ,लोग चुप, पानी नहीं, लोग चुप, सडक नहीं ,लोग चुप, घूसखोरी सब ओर ,लोग चुप, सत्ताबाज़ी सब ओर ,लोग चुप, नस्लवाद सब ओर ,लोग चुप, आतंकवाद सब ओर लोग चुप, भेदभाव सब ओर लोग चुप, आजादी की ६५वी वर्षगाठ मनाते , देख मेरे भाई गुलामो का देश. देश की नीति बदतर ,लोग चुप, विदेश नीत्ति,गुलाम नीति,लोग चुप, देश को बेचते नेता लोग चुप, सिपाही बिक रहे लोग चुप, बेटियां नंगी लोग चुप, बेटे भटकते लोग चुप, दी में सीनाजोरी लोग चुप, रात में चोरी लोग चुप, रोजगार नहीं लोग चुप, व्यापार नहीं लोग चुप, उधोग नहीं लोग चुप, देख मेरे भाई उपभोक्ताओ का देश. आनाज हम खरीदते लोग चुप, आनार हम खरीदते लोग चुप, हथियार हम खिरीदते लोग चुप तकनीक हम खरीदते लोग चुप, देख मेरे भाई लाचारो का देश.

यह गाजियाबाद की जिन्दगी है.

रात को बिजली नहीं,नींद नहीं, दिन में पानी नहीं ,चैन नहीं, काली हवा है ,साँस की बीमारी , यह गाजियाबाद की जिन्दगी है. शहर में पेड़ नहीं,घर है, पैसा है,खूब है तहजीब नहीं, पति है ,पत्नी है संसर्ग नहीं, यह गाजियाबाद की जिन्दगी है. अमीर है जो रोज और अमीर होते है, गरीब है जो रोज और गरीब होते है, समाज है टुटा हुआ है, यह गाजियाबाद की जिन्दगी है. यहाँ मर्द है,नपुंसक है, औरते है जो केवल देह है, कॉलेज है जो दुकाने है, घर है जो मकान है, यह गाजियाबाद की जिन्दगी है. यहाँ व्यापारी है जो पैसे के गुलाम है, मजदुर है जो मालिक के गुलाम है, कर्मचारी है जो घूसखोरी के गुलाम है, यह गाजियाबाद की जिन्दगी है. यहाँ छात्र है ,निकम्मे है, छात्राए है बिकाऊ है,शिक्षक है असक्षम है, यह गाजियाबाद की जिन्दगी है.

हर रोज दिया जलाता हूँ

आसमान छुआ मैंने,पंख झुलस गए तो क्या , पूरी रात जीभर जिया मै,एक रात की नींद गयी तो क्या ? हर बार उठा मै,हर बार खड़ा हुआ, जख्मो का सैलाब लग गया तो क्या ? समुन्दर के किनारे महल मनाया मैंने, रेट के हुए तो क्या ? हर रोज दिया जलाता हूँ, अँधेरा गहरा है तो क्या ?

अँधेरे में चिराग जला देना अच्छा है

डर डर के जीने से ,मरना अच्छा है, कूद के मैदाने जंग में एक बार , तबाही मचा देना अच्छा है. रात होती है तो होने दे, अँधेरे में चिराग जला देना अच्छा है. आंखे खुली है,सोये हुए है सारे लोग, एक बार झकझोड़ कर उठा देना अच्छा है . शोषण है,अत्याचार है सब ओर, एक विरोध का स्वर उठा देना अच्छा है. मैंने प्यार किया है तुमसे, यह बात बता देना अच्छा है. तप रही है धरती,गर्म है हवाएं , एक बूंद ओश का टपका देना अच्छा है. गिर गए सारे महल,बच्चे है बस खँडहर , अपने वजूद को बचाने के लिए, इतिहास याद दिला देना अच्छा है. सदियों की गुलामी,वर्षो की दासता , अब बेड़िया गिरा देना अच्छा है.

जिन्दगी रूठ गयी है

जिन्दगी रूठ गयी है, और लोग मुझे अकेले होने नहीं देते. इस अँधेरी रात में ,दरवाजे सारे बंद है और लोग मुझे सोने भी नहीं देते. नदी, नाले सब सूखे पड़े है, और लोग मुझे रोने भी नहीं देते. तोड़ दिए सारे धागे ,छोड़ दी है डोरी, पतंग को लोग मेरे खोने नहीं देते.

अब तो बस तुम्हारी चर्चा होती है

अब तो दिन रात बस तुम्हारी चर्चा होती है, दिन में तेरे आँखों की,रात में तेरे इरादों के. अब तो बस राख बचे है, कुछ हमारे सपनो के, कुछ हमारे घरंधो के . अब तो बस उमीद बची है, कुछ हमारे मेहनत से, कुछ तुमरे दुआओ से.
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CHANAKYA ABOUT WOMEN...... 1. 15. Do not put your trust in rivers, men who carry weapons, beasts with claws or horns, women, and members of a royal family. 1. 17. Women have hunger two-fold, shyness four-fold, daring six-fold, and lust eight-fold as compared to men. 2.1. Untruthfulness, rashness, guile, stupidity, avarice, uncleanliness and cruelty are women’s seven natural flaws. 2.15. Trees on a river bank, a woman in another man’s house, and kings without counselors go without doubt to swift destruction. 3.9. The beauty of a cuckoo is in its notes, that of a woman in her unalloyed devotion to her husband, that of an ugly person in his scholarship, and that of an ascetic in his forgiveness. 4.17. Constant travel brings old age upon a man; a horse becomes old by being constantly tied up; lack of sexual contact with her husband brings old age upon a woman; and garments become old through being left in the sun. 5.6. The learned are envied by the foolish; rich men by the poor; chaste wom...

मै मौत के लिए जिद्दी हूँ

तुम कान से जिद्दी हो, और मै जुबान से जिद्दी हूँ तुम ईमान से जिद्दी हो, और मै फरमान से जिद्दी हूँ, तुम संस्कार से जिद्दी हो, और मै सम्मान से जिद्दी हूँ, मै अहंकार के लिए जिद्दी हूँ, तुम स्वाभिमान के लिए जिद्दी हो, तुम दिन के लिए जिद्दी हो, और मै रात के लिए जिद्दी हूँ, तुम जिन्दगी के लिए जिद्दी हो, और मै मौत के लिए जिद्दी हूँ.

सुना है जनतंत्र आया है

सुना है जनतंत्र आया है, शेरो पर अब बकरिया राज करेगी, हंस दाना चुनेगे, और गीदड़ प्रधानमंत्री होंगे. सुना है जनतंत्र आया है, सब ओर समानता होगी, चिट्टी और हाथी को सामान अधिकार होगा, और चिट्टी को आरक्षण मिलेगा, हाथी से बराबरी करने के लिए. सुना है जनतंत्र आया है, अब संख्या से निर्णय होगा सफलता का, सत्ता का,सम्मान का,संस्कार का, सच का,झूठ का,पाखंड का और पाप का, दस चोर सच्चे होंगे और इक इमानदार बईमान. सुना है जनतंत्र आया है,

मै सच बोलने से डरता हूँ,

मै सच बोलने से डरता हूँ, क्यों की मेरा इक परिवार है, और मुझे रोटी कमाना है, मै कमजोर नहीं हूँ, मजबूर हूँ . ये मज़बूरी बस मेरी नहीं,सबकी है. मै सच बोलने से डरता हूँ, इसलिए लोग मुझे लूट लेते है, मेरे खून को चूस लेते है, और जब कुछ बोलता हूँ, तो जेल में ठूस देते है. मै सच बोलने से डरता हूँ, इसलिए मेरे सामने क़त्ल होते है, बलात्कार और भ्रष्टाचार होते है, मै डरपोक नहीं हूँ,दहशत में हूँ, मै ही नहीं ये सारा देश. मै सच बोलने से डरता हूँ, क्यों की मै आम आदमी हूँ, और मेरे में यातना सहने की ताकत नहीं, झूठ और प्रपंच का सहारा नहीं है मेरे पास, इसलिए सह लेता हूँ,मै ही नहीं सभी चुपचाप.

वक्त अब बलिदान मांगता है

वक्त अब बलिदान मांगता है, टूट गयी है कुर्सिया, फूट गए है दर्पण, साबुन ख़त्म हो गया है, और झाड़ू नहीं लगा सालो से, अब यह कमरा एक अदद कूड़ा -दान मांगता है, वक्त अब बलिदान मांगता है. खा-खाकर पेट फटा जा रहा, सुनाई नहीं देता था पहले, अब तो दिखाई भी नहीं देता, सूंघ पाते नहीं खतरों को, दोस्तों जनतंत्र अब इलाज मांगता है, वक्त अब बलिदान मांगता है, टूट गयी है कुर्सिया, फूट गए है दर्पण, साबुन ख़त्म हो गया है, और झाड़ू नहीं लगा सालो से, अब यह कमरा एक अदद कूड़ा -दान मांगता है, वक्त अब बलिदान मांगता है. जाति की लड़ाई, संख्या के दम पर लोगो को दबाने की करवाई , मानव -अधिकार लूट जानना , देश अब बदलाव मांगता है, वक्त अब बलिदान मांगता है,

पिया तू मुझसे दूर,

पिया तू मुझसे दूर, क्या है मेरी भूल बता दो, इस सावन पर तो तरस खाओ , आ जाओ अकेली हूँ, बस अब मान भी जाओ. पिया तू मुझसे दूर, क्या है मेरी भूल बता दो, इन रातो पर तो तरस खाओ, जागती रहती है , तेरी इंतजार में,बस तेरे. पिया तू मुझसे दूर, क्या है मेरी भूल, इन यादो पर तो तरस खाओ, जाती नहीं है, पड़ी है तेरे आगोश में,बस तेरे. अब देर न कर,बरष जाओ, टूट कर ,फुट कर.