हर रोज दिया जलाता हूँ

आसमान छुआ मैंने,पंख झुलस गए तो क्या ,
पूरी रात जीभर जिया मै,एक रात की नींद गयी तो क्या ?
हर बार उठा मै,हर बार खड़ा हुआ,
जख्मो का सैलाब लग गया तो क्या ?
समुन्दर के किनारे महल मनाया मैंने,
रेट के हुए तो क्या ?
हर रोज दिया जलाता हूँ,
अँधेरा गहरा है तो क्या ?

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