लिखते क्यों नहीं
लिखते क्यों नहीं ,
परदा क्यों दाल देते हो आगे ?
स्वच्छ हवाओ को क्यों नहीं आने देते ,
खिड़की क्यों बंद कर देते हो ?
चार ही तो दिन होते है,
क्या तुम ये भी नहीं जानते ?
डर जाते हो. क्यों ?
कुछ नहीं होता वहां ,
सिर्फ भौजाल होता है,
कुकुरमुते उपजते है,
कुत्तो का भोकना काम होता है ,
तुम रुक क्यों जाते हो ?
तुम तो समुन्द्र लाँघ सकते हो ,
ये तो फिर भी तालाब है,
दौड़ते जाओ ,
देखो ! आगे ही तो गाँधी का आश्रम है ,
उनका बलिदान है ,
उनका बेख़ौफ़ आवाज भी सुनाई देगा,
सुनना करीब जा कर,
कई आवाजे तुम्हे बुला रही होंगी ,
कई बांहे तुम्हरे स्वागत में कड़ी होंगी,
एक बाण भी तो तुमने छोड़ा था ,
तुम बोलते क्यों नहीं ,
अपना मुह क्यों नहीं खोलते ?
तुम तो तूफान हो,
हवाएं हंसती है ठहाका मार कर,
मायूस नहीं होती,
बिजली गिरा देती है ,
आतंक धाह देती है ,
क्या रूम राम को भूल गए हो ?
तुम हनुमान को याद करो ,
तुम भूल रहे हो अपना बल,
अपनी गति,लय
और
तेजी,वेग ,दिशा
जिसके सामने पछाड़ खाती है राहे,
मिटटी जाती है दुरी,
वो तुम्हारी लुवाठ कहा है ?
जिसको तुम थामे रहते हो ,
अरे उसको उठाओ ,देखो
वहां तुम्हे पूरा हुजूम बुला रहा है ,
तुम ही तो हो जिसका ,
मैंने सदियो इन्तजार किया ,
वर्षो गुजार दिए सहते पीड़ा ,
इस आस में की तुम आओगे ,
अब तुम आ गए हो ,मै खुश हूँ,
क्योंकि सूरज उग रहा है ,
देखो वहां से किरणे आ रही है.
Comments
Post a Comment