मै एक लड़की कि तस्वीर बनता हूँ.
मै वर्षो तक ,
अकेला बुझा -बुझा सा रहता था ,
न कोई मेल-मिलाप , न क्रियाशीलता ,
ठीक वैसे ही ,
जैसे
भीड़ -भरी सडक पर ,
निडर ,थेथर -सा पड़ा एक पत्थर .
मै वर्षो तक,
रोता रहता था ,
बिना आंसू के ,
बेआवाज ,
और सिमटते जाता था शून्य में ,
वैसे जैसे
घोघा पानी कि बूंदों को समेटे ,
अपने में सिमटा रहता है ,
और लड़ते रहता है अपने आप से.
वर्षो तक
गुडिया उंगली पकड़ कर चलना सिखलाती रही ,
लेकिन
उसके जाने के बाद अपंग हो गया हूँ.
मै वर्षो तक
आड़ी-तिरछी लकीरे खिचता था ,
कविता के नाम पर शब्दों कि डेर लगा देता था ,
तुने मुझे काव्य सौन्दर्य सिखलाया ,
अब मै एक लड़की कि तस्वीर बनता हूँ.